बहू रानी

विमल अपनी नयी-नवेली के साथ दरवाजे पर खड़ा है। माँ दरवाजा खोलती हैं।विमल के साथ खड़ी लड़की को सुहाग का जोड़ा पहने देख उनका माथा ठनक जाता हैं। विमल की माँ आरती कुछ और सोचे उसके पहले ही दोनों आरती के पैरों पर झुक जाते हैं।
      विमल पर अंध स्नेह रखने वाली आरती के लिये यह बड़ा धक्का हैं।उनके लालड़े ने उन्हे विश्वास में लिये बिना जिदंगी का इतना बड़ा फैसला ले लिया।उन्हें बड़ा मुगालता था,सारा इस लड़के ने धराशायी कर दिया। दरवाजे पर ही लड़का अपनी नयी ब्याहता को लिये खड़ा है।अब आर्शीवाद तो देना ही पड़ेगा।
     आरती का दिमाग चल रहा हैं"काहे माने हम इसे अपनी बहू।विमल हमसे पूछा रहा क्या, बिहाने से पहले?अब काहे आये है आर्शीवाद का स्टेंंप लगवाने।का हमारा आर्शीवाद सुखी जीवन का गांरैन्टी लिया हैं?'
    उनका मन किया कि अपने लड़के को हांक दे पर सामने बहू खड़ी थी।
    लड़के और बहू को उनके पैरों पर झुके खासा समय हो गया।लड़के ने ऊपर देखा तो माँ गायब।
विमल ने धनुष की तरह अकड़ चुकी पीठ को सीधा किया।स्नेहा को हुंकार लगायी,"उठ जाओ,माँ तो लगता बहूतई नाराज हो गई हैं।"
   "काम ऐसा किये हो तो का आरती उतारे तुम्हारी?"आरती आरती का थाल सजाये बाहर आते बोली।
   

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