अंतिम किस्त

आजकल पापा ज्यादा बोलते नहीं हैं|खुरपेंच करने वाले पापा के करीबी शांत बने हो,ऐसा तो नहीं लगता|पर उनके चलाये शस्त्रो का वार खाली ही जा रहा हैं|
      कल ऑफिस से आते पापा को हल्का स्ट्रोक पड़ा हैं| अस्पताल से लेकर घर तक माँ  ही उनकी सेवा कर रही हैं|उनके अजीज दूर बैठे उनके अच्छा हो जाने की मंगलकामना कर रहे हैं|
"Hippocrate",अंकुश कह उठता हैं|
उसकी आवाज पापा के कानो तक पहुँची ही हैं|पर वे वैसे ही अविचलित लेटे हैं|
     कुछ महीनों की माँ की सेवा से पापा फिर से उठ खड़े हुये हैं|पापा के सारे मुँह  बोले आ हालचाल पुछने की रस्म निभा जा चुके हैं|अंतिम किस्त में आने वालो को पापा कड़ाई से दोबारा कष्ट न करने को कह चुके हैं|
    पापा के पूणर्तः स्वस्थ्य हो जाने पर उनके घरवालो ने पूजा रखवायी हैं|पापा ने माँ को इस पूजा मे   अपने बराबर बिठाया हैं|जिससे कईयों के सीने पर साँप लोटे हैं|
   "तेरे लिये पूजा रखवायी हैं|न कि किसी........"
पापा की घुरती नजरों से उनके बाकी के शब्द हलक मे ही घुट जाते हैं|
     "Hippocrate"आज पापा भी अंकुश के शब्द दोहराते हैं|
     अंकुश बेहद खुश हैं|माँ की इतने साल की तपस्या आज फलीभूत हूई हैं|उसे रंज तो हैं और कही ये डर भी कि कही ये सुख क्षणिक न हो|पापा के ऊपर से खोया विश्वास इतनी आसानी से तो नहीं फिर से जमेगा|
      माँ सोच रही हैं कि बच्चे ही कभी मातापिता को सही राह दिखा जाते हैं|
  माँ का रिश्तेदारी में वो स्थान बनने लगा हैं जिसके लिये उन्होंने अपना शरीर गला लिया|पर अब ये जीत उनके लिये मायने नहीं रखती|जानती हैं ये जीत दवाब की हैं स्नेह की नहीं|
     माँ और अंकुश दोनो को लगता हैं कि शुरुआत तो हूई|भले ही वो पीछे छुटे सालो की भरपाई न कर पाये|

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