दूसरी किस्त

ये सब सत्कार चल ही रहा था कि पीछे दरवाजे से छोटा बाबू हाजिर हो गये|छोटा बाबू ,आरती के पति|कद के मामले मे छोटा बाबू आरती से उन्नीस ही ठहरते|
      अब छोटा बाबू आये, ये कौन बड़ी बात थी|पर वे अपनी वही पटरे वाली जांघिया पहने धड़धड़ाते चले आये|आरती ने देखा तो माथा पकड़ लिया|तनिक आड़ मे जा जांघिया के ऊपर लूंगी चढ़ा लेने के लाख इशारे किये पर छोटा बाबू ठहरे खर बुद्धि|आरती के इशारो को वे ताड़ नहीं पाये|खी-खी कर कुछ कहने को ही हूये कि विमल के साथ आयी लड़की के पहनावे को देख अचकचा गये|
       इतनी हलचल से लड़की भी अंदाजा लगा गई कि कमरे मे कोई तीसरा आया हैं,सो नजर नीची कर संभल कर खड़ी हो गई|
   आरती ने नयी बहू की नीची नजर को परखा और झट आरती का थाल विमल को पकड़ा अलगनी से लूंगी खींच लायी|
दबे स्वर मे छोटा बाबू को घुड़का,"बांधो इसे"
जल्दी लूंगी अपने चारो ओर खोंस अपनी भूमिका मे आ गये|
"ये किसका आरती -सत्कार हो रहा हैं?"
"आपका बेटा,बहूरिया ले आये है|उसी का सारा ताम-झाम हैं|तुम काहे पीछे खड़े हो गये?तुम भी सत्कार कर लो"आरती के स्वर मे व्यग्यं का पुट था|
   छोटा बाबू तनिक हिचकचाये और साथ ही उन्हें भारी अंचभा भी हुआ,"बड़ा हिम्मत दिखाया बच्चवा"मन ही मन खुश होते सोचे|
"हाँ हाँ अपना बहू का सत्कार काहे न करेगे"कह अपना हाथ बहू के सिर पर झपाक से धर दिया|

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