तीसरी किस्त

इधर पिछले रविवार सूजी(मि.डिसुजा की बेटी)आ नहीं पायी|फोन करने पर मालूम हुआ कि उसे मियादी बुखार ने आ घेरा हैं|उनका दिल बैचेन होने लगा|उन्हें मालूम था कि सूजी उनसे बुखार की गंभीरता के बारे में बतायेगी नही|वो तो बुखार के बारे में भी न बताती|पर उसकी आवाज ने सारी स्थिति बयां कर दी|सूजी को मालूम तो था कि डैडी बेवजह परेशान ही होगे|पर इस बार हिम्मत कर मि.डिसुजा सूजी से मिलने अकेले ही चल दिये|साथ देने को भी किसको आवाज देते|
    डैडी को अपने सामने देख सूजी हैरान भी हूई और उसे ब हूत राहत भी हूई|इधर जब से माँ नहीं रही  हर इतवार डैडी को देख लेना उसकी आदत में शामिल हो गया था|
       आकर मि.डिसुजा ने अपने दायरे तक जो संभव हो सकता था,उतनी सूजी की मदद की|इससे उनके दिन व्यस्त हो जाते|दिल में बेटी के लिये कुछ कर लेने की भी संतुष्टि रहती|
     केविन को घर की दोहरी जिम्मेदारी से छूट मिली|वैसे भी बुजुर्गों की छत्रछाया से सूकुन तो मिलता ही हैं|ये बात दीगर थी कि केविन ने इसे कभी जाहिर न  होने दिया|कितने दिनो बाद मि.डिसुजा को घर में घर सा अहसास हुआ|
     मि.डिसुजा को लगा जैसे वे मैरी की भूमिका में आ गये हो|मैरी की तरह ही उन्होंने बेटी की फिक्र करनी शुरू कर दी थी|मैरी को जैसे उन्होंने अपने में ओढ़ लिया था|
       सूजी को इतने दिनो बाद आज लगा कि वो बेफिक्र हो बीमार रह सकती हैं|

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