दूसरी किस्त

मि.डिसुजा का बेटी के यहाँ बन आना हो नहीं पाया|पर बेटी की ममता,उसे डैडी तक खींच लाती|सारा घर सुव्यवस्थित कर वो चली जाती|हंलाकि बेटी का यूँ दो पाटो में पीसना उन्हें तकलीफ देता|सप्ताह के अंत में परिवार समेत कही घुमने का उसका कार्य कम्र डैडी की घर गृहस्थी की भेंट चढ़ जाता|उसने कभी इस बात की शिकायत नहीं की|पर दामाद के मुँह से कुछ ऐसा निकल ही जाता कि वो कसमसा कर रह जाते और बिटिया को अगले सप्ताह न आने की सख्त हिदायत मिलती|
        "बेटी अगले सप्ताह तु कही घुमने का प्रोग्राम बना कर निकल जाना|जॉन भी तो कहीं घुम आने को तरस ही जाता होगा|उसने भी नाना के घर के अलावा कोई दूसरी जगह देखी ही न होगी|"मि.डेविड कहने को तो कह जाते हैं पर  वे भी जानते हैं और बिटिया भी कि नाती से मिलने की आस ही उनका सारा सप्ताह निकालती है|
   मि.डेविड जानते हैं कि हर सप्ताह की ये व्यवस्था ज्यादा दिन चलेगी नहीं|बिटिया की गृहस्थी में दरार डालना तो वे नहीं चाहते|
   यही सब सोच वे बेटी के साथ कही घुमने का प्रोग्राम भी बनाते हैं|पर दामाद की लगातार घुरती नजरे उनको असहज बना देती|तब उनको ऐसा लगता जैसे वे एक कठपुतली की मानिंद केवल उनके पीछे घिसटते जा रहे हैं|
      ऐसे में उन्हें लगता मैं घर में ही भला था|अपने फ्लैट के आसपास उठती आवाजें,उनमें नितांत अकेले हो जाने का जब आभास करवाती तब वे और कुठिंत से होते जाते|तब अक्सर वे सामने बने पार्क की किसी खाली बेंच पर घंटो गुजार देते|
   पार्क उन्हें जीवन का अहसास दिलाता|खाली फ्लैट में जाने में उन्हें घबराहट होती|बेहताशा थक जाने पर ही वे घर जाते|केवल सो जाने के लिये|

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