मिस्टर. डिसुजा थके कदमों से एक-एक सीढी नापते अपने घर के दरवाजे के आगे आ टिके हैं|घर खोल अंदर चले जाने की उनको कोई जल्दी थी भी नहीं|घर मे इतंजार करता कोई बैठा भी तो न था|पर उम्र के इस पढ़ाव पर आते उनकी ताकत निचुड़ सी गयी हैं|तन से और मन से भी|
अपनी बेलगाम सांसो को काबू कर कमरे में चले आते हैं|मैरी थी तो उन्हें कुछ सोचना न पड़ता|बिन बोले सब हाजिर रहता|तब उन सब बातों की कीमत नहीं आंक पाये कभी|अब रह रह कर सोचते कि समय पीछे चला जाये और वे मैरी को जी भर आराम दे सके|
आज जब मैरी की उनको सबसे ज्यादा जरूरत हैं तो वही किनारा कर गयी|
मि.डिसुजा नितांत अकेले हो इस संसार में ,ऐसा भी नहीं|मुबंई के सूदूर कोने में उनकी बेटी बसी है|और उसके अंदर भी बेटी होने के जन्मजात गुण हैं|उसे अपने डैडी के नितांत अकेले हो जाने का आभास हैं|और आज का माहौल देख एक अनजाना सा डर भी|
माँ के चले जाने के बाद उसने बेतरह कोशिश की कि डैडी उनके साथ रहने चले आये|अपने पति से कई बार दवाब भी डलवाया|पर मि.डिसुजा की अनुभवी आँखे दामाद के इसरार के पीछे छुपे रूखेपन को परख चुकी हैं|दूसरे इस घर से जुड़ी मैरी की यादो से वे चाह कर भी किनारा नहीं कर पाते|
इस घर में ही तो उन्हें अहसास होता हैं कि मैरी उनके साथ बनी हैं|हर काम में,हर चीज में|
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