तीसरी किस्त

जब पेरू सूर्य बन आकाश में चमकने लगा तभी बादल के कुछ टुकड़े आये और उन्होंने सुरज को ढ़क लिया|अब पेरू को लगा कि बादल ज्यादा शक्तिशाली हैं|उसने माँ काली की प्रार्थना की कि उसे बादल बना दे|बादल बन वो आकाश में विचरण करने लगा|तभी हवा का तेज झोंका आया और वो गेंद की तरह इधर उधर ढोलने लगा|उसने फिर माँ काली को याद किया|वे उसके बोले बिना समझ गयी और उसे हवा बना दिया|
पेरू  हवा बन बहने लगा|तभी मार्गमें उसके विशालकाय पहाड़ आ गया|उसे देख पेरू को लगा कि सचमुच पहाड़ ही सबसे ज्यादा शक्तिशाली हैं|अतः उसने माँ काली की फिर आराधना की|माँ ने उसे पहाड़ बना दिया|
  अब पेरू पहाड़ की तरह तन कर खड़ा  हो गया|लेकिन एक दिन उसे लगाकि कोई उस पर प्रहार कर रहा हैं\उसने नीचे देखा तो बिल्कुल उसी की तरह दिखने वाला एक आदमी पहाड़ पर प्रहार करता जा रहा था|
   ये देख पेरू सोचने लगा,"मैं बेकार हीइस फेर में पड़ा|आज मुझे पता चला कि मैं बेकार ही दूसरो को अपने से ज्यादा शक्तिशाली समझ दुखी होता रहा|मेरा जीवन और काम दोनो ही बहुत अच्छे थे"
   इस बार उसने दुखी मन से माँ काली को बुलाया और बोला,"माँ मुझे समझ आ गया|कि मैं जैसा भी था बहुत अच्छा था|आप मुझे एक बार फिर पेरू बना दे|अब मैं आपसे कोई शिकायत नहीं करूंगा|"
   ये सुन माँ काली बोली,"बेटा इस दूनिया मै अक्सर लोग तुम्हारी तरह गल्ती करते हैं|दूसरो के जीवन को देख सोचते हैं कि उनका जीवन हमसे बेहतर हैं|पर ऐसा नहीं होता|सघर्ष और मेहनत हर किसी के जीवन का पहला पाठ हैं|जो इस पाठ में पास हो जाता हैं वो जीवन की किसी भी परीक्षा को पास कर सकता हैं|और जीवन चैन से जीता हैं|"
    इसके बाद माँ काली ने पेरू को फिर से पेरू बना दिया|इतने में उसकी आँख खुल गयी|उसने शीशे में अपने को देखा और पाया कि वो जैसा था अभी भी वैसा ही हैं|वो मुस्कुरा दिया|सपने में ही सही उसे जीवन की एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी थी|

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top