दूसरी किस्त

सारे मजदूर पेरू की बात सुन कहने लगे,"दूसरों का घर बनाते-बनाते हम अपना घर कहाँ बना पाते हैं?हम शक्तिशाली लोगों में नही है|एक बार तु शक्तिशाली बन कर तो देख|"
    इस प्रकार चर्चा होते-होते रात हो गई|खाना खाने के बाद वो सोने जा ही रहा था  कि क्या देखतख है कि उसकी झोपड़ी में चारो ओर उजाला हो गया हैं|और माँ काली साक्षात खड़ी उसे बोल रही हैं,"पेरू मैं तुझसे बहूत प्रसन्न हूँ |बोल तुझे क्या चाहिए|"
    कुछ देर पहले हुई बात इस तरह सच हो जायेगी इसका यकीन पेरू को भी नहीं था|उसने माँ को दड़वत् प्रणाम किया और कुछ सोचते हुए बोला,"माँ आप मुझे फल-फूलों से लदा छायादार वृक्ष बना दीजिए|मुझे लगता हैं ऐसा वृक्ष सबसे ज्यादा शक्तिशाली होता हैं|"
     थोड़ी ही देर में पेरू एक छायादार वृक्ष बन गया|पर थोड़ी ही देर मे उसे लगा कि तेज धुप में उसके पत्ते सूख रहे हैं|अब उसे लगा कि उससे ज्यादा शक्तिशाली सूर्य हैं|उसने फिर माँ काली की आराधना की|
  माँ प्रकट हो बोली,"कहो बेटा क्या हुआ"?
पेरू बोला,"मुझे तो सूर्य अधिक शक्तिशाली लगता हैं|जिसकी गर्मी से दूनिया दहल जाती है|आप तो मुझे सूरज बना दीजिये|"
    माँ मुस्कुरायी और उन्होंने "तथास्तु"कहा|
कुछ ही देर में पेरू सूर्य बन आकाश में चमकने लगा|

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