पांचवी किस्त

दिव्या दूसरे दिन इंतजार करती रही कि पापा आयेंगे उसे मनाने पर शलभ इस बार कठोर हो उठे थे|🙅🙅🙅मंजरी का मन शलभ के इस व्यवहार से नहीं पिघलना था|🙅🙅घाव गहरा था वक्त तो लगता भरने मे|🎊🎊इतने दिनों का अपमान क्या एक दिन मे उतर जाता?🎊🎊वो सारी घुटन, वो खालीपन एक दिन का तो नहीं था?😢😢एक वो था जिससे वो जिदंगी भर के  लिए जुडी थी र एक वो जो उसके पेट की जाई थी|💝💝मंजरी यूं ही बनी रही संवेदनहीन|
     दिव्या ने अब खाना  खाने को अपना नया हथियार बनाया| उसका ये हथियार बिल्कुल सटीक और गहरे घाव देता था|🙅🙅अपने इस हथियार के पैनेपन को दिव्या ने कई बार आजमाया|🙅🙅
      इस तरह मानसिक रूप से शोषित मंजरी की सेहत पर गहरा असर पडा| औऋ जक दिन किचन मे काम करती वो ग खा कर गिर पडी| आवाज सुन शांतनु ही आया भागता हुआ|😘😘 माँ के शरीर को अकेले उठाना उसके बस का नहीं था| तब मजबूरन उसे दीदी को आवाज देनी पडीं|🙅🙅दीदी ने जब माँ के शरीर मे कोई  हरकत नही देखी तो घबरा उठी|पापा टूर पर थे| अकेले उसके हाथ-पैर फूल गये|
    पडोस से मंजरी के अच्छे संबंध थे|मंजरी को अस्पताल पहुंचने और बच्चों के खाने-पीने का इंतजाम करना, ये दोनों मोर्चे ही पडोसियों ने संभाल लिए|💝💝दिव्या को तभी अहसास हुआ कि जिस माँ की उसने कभी कद्र न की, उनकी पडोसियों मे कितनी इज्जत हैं|🎊🎊

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