चौथी किस्त

जब शांतनू स्कूल से आया तब मंजरी उठकर उसे खाना परोसने किचन मे गयी|😘😘माँ का ये तरीका देख दिव्या भीतर तक जल उठी|🙅शीत युद्घ चल रहा था  सो मंजरी अपनी उम्र की सारी समझाइश छोड़ दिव्या को उसकी हर हरकत का जवाब उसी के अंदाज मे दे रही थी|🙅🙅
   ' पापा से ये शिकायत जरूर करूँगी' दिव्या ने मन बना लिया| पापा उसी का साथ देगें,इस बात का उसे पूरा यकीन था|🎊🎊
     दूसरे दिन जब शलभ आये तो दिव्या ने उन्हें पानी का गिलास तक पुछने की जहमत न उठायी| बस,एकदम अपनी व्यथा कथा ले कर बैठ गयी|🙅🙅🙅🙅" बेटी बाद मे बात करते हैं|" कह शलभ ने सोफे पर अपना सिर टिका दिया|
पर दिव्या तो माँ को पापा की डाँट खिलवा देना चाहती थी|🙅🙅🙅🙅🙅
" माँ हैं तुम्हारी!!!तुम्हारी ही कोई गल्ती  होगी तभी माँ ने ऐसा किया|"शलभ ने पहली बार दिव्या के मन के विपरीत कुछ कहा|🙅🙅 दिव्या को यकीन न हुआ|🎊🎊
  मंजरी का मन यही सोचने लगा कि यही काम पहले हो गया होता तो सारे रिश्तों को उसकी गरिमा मिलती|🎊🎊पर अब मिट्टी पक कर आकार ले चुकी हैं|🙅🙅अब नये सांचे मे ढालना आसान तो नही होगा|😘😘
  दिव्या के दंभ को चोट लगी सो वो दनदनाती अपने कमरे की ओर गई|पीछे शलभ ने उसे मना लेने की कोई उत्सुकता भी नहीं दिखाई|जाते समय दिव्या ने मंजरी को खा जाने वाली नजरों से घुरा|🙅🙅मंजरी ने उसे अनदेखा कर दिया| शलभ अभी बाहर से आये थे| सो,वो बात को बढाना नहीं चाहती थी|🙅🙅
   शलभ देख रहे थे मंजरी की ओर|आज शायद उनके भीतर कुछ दरक गया था|🙅🙅  अभिमान या ग्लानि|

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top