तीसरी किस्त

मंजरी का मन अक्सर पीछे की ओर मुड़ जाता|💝💝छोटी सी दिव्या कैसे उसके आगे पीछे घुमती|🎊🎊माँ का जरा बिछोह उससे सहन न होता|हमेशा माँ के साथ बने रहने वाली दिव्या कब छिटक कर बडी हो गयी, उसे आभास ही नहीं हुआ|😘😘
    शलभ की लालड़ी थी दिव्या|शलभ ने मानो दिव्या की हर उचित अनुचित मांग को पुरी करने का मन बना लिया हो जैसे|💝💝मंजरी की टोक वे लापरवाही से नकार देते|शायद ऐसे ही किसी वक्त दिव्या का मन माँ के प्रति विद्रोह से भर उठा हो|😘😘मंजरी की गल्तियां निकाल शलभ दिव्या को बताते और बाप-बेटी खुब मजा लेते|💝💝
     दिव्या के मन मे माँ की अवहेलना करने की नींव ऐसे ही किसी पल पड़ी होगी|
    मंजरी निपट अनपढ़, गंवार हो, ऐसा भी नहीं था|उसने भी इतिहास से परास्नातक की डिग्री ली थी|😘😘शादी के बाद और पढ लेने का सिलसिला जम ही न पाया था| शलभ की  सख्त हिदायत थी की पहले घर बच्चे, फिर कुछ और|🎊🎊
     मंजरी ने पुरानी बातों को झटक दिया|सोचते-सोचते कब उसकी आँख लग गयी, उसे पता ही नहीं चला|🎊🎊दिव्या का किचन मे जान बूझकर  बर्तनों की उठा पटक से उसकी नींद उचट गयी|🙅🙅🙅उसका मन खिन्न हो उठा|🙅
"क्या मैं केवल खाना बनाने के लिये ही बैठी हूँ|कभी हाथ लगा कर भी देख ले| चाय तक तो बनाने की तमीज नहीं,तिस पर गज भर लंबी जुबान|🙅🙅
    मंजरी बैठी रही फिर याद आया कि सुबह जो इतनी मुँह जोरी कर गयी थी,तो अन्न का एक दाना पेट मे नही गया|🙅🙅माँ की ममता ने जोर मारा तो जा कर किचन मे खाना तैयार किया पर परोस कर दिव्या को देना उसे गवारा न हुआ|🙅🙅

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