दूसरी किस्त

जब मंजरी के पति शलभ घर पर होते तो दिव्या का वाणी पर संयम रहता|पर उनके हटते  ही दिव्या की आवाज तेज  हो जाती|🙅🙅   मंजरी की बात की अवहेलना करना, उसकी बातों की बेअदबी रोज का शगल था|🙅🙅🙅
    दिव्या मां को बैठी देख चुकी थी और चेहरे पर छाये चिंता के भावों को भी| पर उन सब को देख अनदेखा कर वो अपने कमरे की ओर बढ गई|🙅🙅🙅उसका ये रूखा व्यवहार मंजरी को भीतर तक चोट पहुँचाता था| और ये बात दिव्या जानती थी|
      मंजरी अक्सर सोचती कि जिस बेटी को उगंली पकड़ चलना सिखाया आज उसका कद उससे ऊँचा  हो गया|🙅🙅
      मंजरी का बेटा जरूर उसका साथ देता|दीदी का माँ के प्रति रूखा व्यवहार उससे छुपा तो नहीं था| हर लडाई के बाद वही तो होता माँ के आँसू पोछने के लिये|🙅🙅
   शलभ तटस्थ रहते|🙅🙅मंजरी को ही चुप रहने की सलाह दी जाती🙅🙅 मंजरी कुछ समझाने की कोशिश करती तो बच्ची हैं का जुमला उछाल दिया जाता|🙅🙅उनका यही व्यवहार दिव्या को शह देता|🎊🎊
   शलभ टूर पर थे| अक्सर  ही टूर पर  होते|ऊँचे पद की अपनी जिम्मेदारियों  होती हैं|😘😘 तभी न बच्चों के प्रति उदार बने रहते|😘😘टूर से आने पर "सब अच्छा हो" यही सोच रहती|😘😘मंजरी का कुछ कहना उसे ही कठघरे मे खड़ा कर देता|🙅🙅 इसी वजह से मंजरी चुप हो चली थी|🙅

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