आज छगवा ढाबे में पीली कार का इंतजार कर रहा हैं|हर मंगल को इसी हाईवे से वो कार गुजरती हैं| आगे वाले गाँव के हनुमान मंदिर की बड़ी मान्यता हैं| लौटते वक्त वो इस ढाबे में जरुर रुकते हैं|विशेष रुप से वो छगवा के ही हाथो से खाना मँगवाते हैं| और ढाबे-मालिक की नजर बचा छगवा के हाथ कुछ पैसे टिका देते हैं|
आज छगवा को जरुरत से ज्यादा उत्साहित देख वे पुछ ही बैठे," आज तो तू बड़ा खुश लग रहा हैं? मालिक ने पगार बढ़ा दी क्या?
या तूने कोई दूसरी अच्छी नौकरी पकड़ ली हैं?"
छगवा हंस दिया" साहब, दोनो ही बात नहीं हैं|"फिर छगवा पूरी बात बताता जाता हैं|
" अपनी माँ को पास के गाँव के बड़े अस्पताल क्यों नहीं दिखा देता? हकीम तेरी माँ की तबीयत और खराब कर देगे?"साहब बोले|
" साहब, मेरे पास इतने पैसो का जुगाड़ नहीं हैं| कि मैं माँ को पास के अस्पताल ले जाँऊ| न मेरा मालिक इतनी छुट्टी देगा"छगवा की आवाज में बेबसी हैं|
" तू क्यों फिक्र करता हैं|उस अस्पताल के बड़े डाक्टर मेरे जानने वालो में हैं| अबकी आती बार तुझे और तेरी माँ को लेता जाऊँगा| और न तू पैसे की फिक्र कर , न मालिक की" साहब कह रहे थे|
अगली बार मालिक ने अपना वादा निभाया| अस्पताल के सही इलाज ने माँ को फिर से जीला दिया हो जैसे|
मालिक से ज्यादा हकिम नाराज हैं| उसकी दो-तीन बार की कमाई उसके हाथ से निकल जो गयी थी|
बाद में छगवा को मालूम पड़ा कि पीली कार वाले मालिक निः संतान हैं| और हर मंगल भगवान से एक संतान देने की गुहार लगाते हैं| छगवा से उनका निस्वार्थ प्रेम यही दिखाता था कि उन्हें बच्चो से कितना लगाव हैं|
पीली कार के मालिक चाहते हैं कि छगवा अपनी बेगारी छोड़ पढ़-लिख ले| ढाबे में काम कर उसका कोई भला नहीं होना हैं|
माँ की तबीयत में काफी सुधार हैं| वो भी चाहती हैं कि अब छगवा अपना जीवन संवारे| पीली कार वाले साहब छगवा और माँ दोनो को अपने साथ शहर लिवा ले गये हैं| छगवा की पढ़ाई के लिये| माँ दो-चार घरो में काम कर लेती हैं| दोनो का गुजारा हो जाता हैं|
पीली कार वाले साहब की वजह से ही छगवा के जीवन से बेगारी का श्राप खत्म हूआ और आगाज किया एक नये जीवन|
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