बहुत सोच-समझ कर भाई-बहन ने कोई ऐसा काम ढुंढने की कोशिश की जो बाबूजी के मन-माफिक हो| बाबूजी हिसाब-किताब में शुरु से तेज रहे थे| पर जंमीदारी में तो ये जरुरी भी था|विशन ने सुझाया कि क्यों न पास बने ऑफिस में बात की जाये| बाबू वहाँ का हिसाब-किताब देख लेगे|
" बच्चवा, अब बाबूजी मुनीमगिरी करेगे क्या? इस बात के लिये बाबू कभी तैयार न होगे|" बहन ने कहा|
बहन ने कहा," हम लोग जिनके लिये इतनी माथाफोड़ी कर रहे हैं| पहले उन्हें तो मानसिक तौर पर तैयार करे कि यूँ खाली बैठने से अच्छा कुछ ऐसा काम करे जिसमें उनका मन भी रमे और ज्यादा भार भी न आये|"
विशन का ये अंतिम साल था| बाबूजी को ये जान कर ही हैरत हूई कि इस उम्र के भी कई काम हैं जो वे कर सकते हैं| वरना् तो उन्होनें अब तक इतने उम्र के लोगो को चौपाले में हुक्का गुड़गुड़ाते ही देखा था|
बाबूजी जोश से भर गये|और इतने दिनो की माथापच्ची के बाद जो सुझाव आया वो बाबूजी की तरफ से ही था|
बाबूजी ने भी इतने बरस जंमीदारी का काम देखा था| सो, "बच्चवा क्यों न हम आम के कुछ बाग खरीद ले| "पिछले बरस हरिया बताय
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