जोगिश्वर बाबू चौपाल में बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे| आस-पास चेले-चपाड़ो का मजमा लगा था| जोगिश्वर बाबू ठहरे पूराने जंमीदार परिवार से| गाँ वालो के ऊपर उनका बडा़ दाब-मान था|
पत्नी बीते साल गुजर गयी| अकेले रह गये| सो, अब ज्यादातर समय उनका इसी चौपाल में, नीम के पेड़ तले गुजरता|जमींदारी के समय का एक पूराना नौकर था, जो उनकी रोटी-पानी का जुगाड़ कर देता| उसका भी सहारा जोगीश्वर बाबू ही थे,सो, उसकी रोटी का भी इंतजाम हो जाता|
खेती-बाड़ी काफी थी अभी भी| आमदनी का जरिया बना हुआ था| फिर खानदामी रईस थे| तो काफी कुछ जोड़ भी रखा था|
बिना औरत के घर काटने को दौड़ता| साल दो साल इसी तरह निकाल लिये| दो लड़कियो, एक लड़के का ब्याह कर दिया था| सब अपनी गृहस्थी में रमे थे| जब-तब लड़कियाँ उनके पास बन आती| तो उनके लड़के-बच्चो में उनका मन रमा रहता|
छोटा लड़का शहर में रह कानून की पढ़ाई कर रहा था|
" ये मुई आजकल का पढ़ाई का होती हैं| बवाल हूई जाती हैं| बताओ लड़कन का दाढ़ी-मुंछ उग आयी और ई पढ़ाई नाही बंद हूई" ये कह वो ठहठहा कर हंस देते| गाँव वाले पूरा साथ देते|
पर इन सब से अलग जोगीश्वर बाबू का मन जानता था कि उनका लड़का लायक हैं और बहूत जल्द बड़ा आदमी बनेगा|
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