वो जमीन धंसने लगी हैं
जिस पर कभी महल खड़ा था उम्मीदो का|
रास्ते तो वही जा ठहर जाते हैं,
जहाँ से मैंने जिदंगी को पाया था|
वो जमीन धंसने लगी हैं
जिस पर कभी महल खड़ा था उम्मीदो का|
रास्ते तो वही जा ठहर जाते हैं,
जहाँ से मैंने जिदंगी को पाया था|
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