सुबीर ने इरा की ओर देखा| इरा की यादशादत अभी काफी कमजोर हो गयी थी| उसे याद ही नहीं आ रहा था कि उसने पर्स में क्या-क्या रखा था!!!!!सुबीर की ओर देख लेना भी उसे गवारा नहीं हो रहा था| उसकी गुस्से से तरेरती आँखो का सामना करने की ताकत उसमें नहीं था|
गनीमत यही रही कि इरा ने कोई भी सोने का सामान पर्स में नहीं रखा था| चलते समय सास ने टोका लगाया था कि" सोने की चेन उतार पर्स में रख लो| कोई गले से खीचं लेगा| जमाना बहूत खराब हैं|"
पर इरा हाँ, हूँ करके रह गयी| सूना गला लेकर घुमना उसे बिल्कुल न भाता था| और उस लिहाज से अच्छा ही हूआ| नहीं तो आज चेन से भी हाथ धो बैठती|
रुपये-पैसे इरा ज्यादा लेकर चलती न थी| हाँ, चूकिं बेटे का जन्मदिन आ रहा था सो, सबने दिल खोल कर व्यहवार दिया था|
बेटे के रुपये चले जाने का मलाल सुबीर को था| वो आंकने बैठा तो पर्स की कीमत सहित दो-ढाई हजार का नुकसान हो गया था|
" औरते होती ही लापरवाह हैं| कितनी बार कहता था पर्स संभाल कर रखो| पर मेरी सुनता कौन हैं?" सुबीर सामने सज्जन से शिकायत करते हूये कहने लगे|
" अब जो हो गया सो हो गया|अब पर्स तो वापस आ नहीं सकता" उन साहब ने समझाने वाले अंदाज में कहा|
अगले स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तब सुबीर ने उसी आदमी को, जो उनके कूपे में बैठा पर्स में रखे सामान का ब्यौरा ले रहा था, उतरता दिखा| उसके हाथ में कोई सामान न था| इसलिये सहयाञी होने का तो सवाल नहीं था| यही वो आदमी था जो दरवाजा रोके खड़ा था|
अब सुबीर को सारा माजरा समझ आने लगा| वो आदमी शायद उसी गैग का था| अंदर आ वो सामान का सारा ब्यौरा लेकर गया था| शायद सामान के बंटवारे के समय कोई उससे चालाकी न कर पाये|
ये सोच कर कि उस गैंग का आदमी उनके साथ बैठा था, इरा के माथे पर पसीना ले आया|
बाद में पता चला कि पीछे की कई बोगियों में एक ही वक्त पर चेन खींची गई थी| सुन कर सुबीर को राहत मिली| वो चेन इरा की भी हो सकती थी| और कुछ ये सोच कर भी कि नुकसान केवल उसका नहीं हुआ और लोग भी उसके साझेदार हैं|
वक्त का ही खेल था| ये वाक्या न हुआ होता तो आज उनका ये सफर सुहाना होता|
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