चौथी किस्त

सुबीर ने बेटे को बस घुर कर देखा| सुबीर जल्दी से दरवाजे की ओर भागा| एक आदमी पूरा दरवाजा घेरे खड़ा था| सुबीर ने दो बार उसे हटने की गुहार लगायी| तब उसने थोड़ी सी भर जगह दी|
       सुबीर ने बाहर झांका| तो सिवाय अधेंरे के कुछ नजर नहीं आ रहा था| बस, बोगी के अंदर जलती लाइट की बाहर आती रोशनी से ही कुछ चेहरे दिखाई दिये| बाकी घुप्प अंधेरा|
      ट्रेन रेंगने लगी थी| सुबीर चाह कर भी कुछ न कर सका| सुबीर जब पलट कर जाने लगा तब उसी आदमी ने टोका," क्या हो गया साहब, परेशान दिखते हो?"
कोई और समय होता तो सुबीर इस " साहब" के संबोधन से फूल कर कुप्पा हो चुका होता| पर आज वो वाकई हैरान था|
" कोई पर्स ले कर भाग निकला मेरी wife का" सुबीर बोल उठा|
वो आदमी सुबीर के साथ ही उसके कुपे के अंदर आ गया| और बिना न्योते के बैठ भी गया|
" शायद साथ के कुपे का कोई याञी होगा" सुबीर उसकी बेतकल्लुफी पर सोचने लगा|
" क्या-क्या चला गया साहब आपका| पर्स में कोई कीमती सामान तो नहीं लेकर चले थे?" वो आदमी बोला|
उस आदमी के कहते ही इरा का हाथ अपने गले पर रेंग गया|उसके चेहरे पर इत्मीनान के भाव उभर आये| इरा ने अपनी चुन्नी को गले के चारो ओर कस कर लपेट लिया|
   उस आदमी के कहने पर ही तो सुबीर का ध्यान इस तरफ गया| वरना् वो अभी तक पर्स चोरी हो जाने का ही मातम मना रहा था|
        साथ आये आदमी का चेहरा उत्सुकता से भर उठा| क्यों- ये सुबीर को समझ न आया|
    पर्स में रखे सामान की फेहरिस्त निकालने के लिये सुबीर ने इरा की ओर देखा| घर की चाबी का तो उसे इत्मीनान था| घर की चाबी वो हमेशा अपने बैग में ही रख कर चलता था| बाकी चीजो की गिनती उसका और खुन उबाल सकती थी|

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