तीसरी किस्त

ट्रेन जहाँ रुकी वो एक छोटा सा स्टेशन था| बाहर गुप्प अंधेरा|हाथ को हाथ सुझायी न देता था| सुबीर को इस बार अपने बेटे की हरकत पर बेतरह खीझ चढ़ आयी| सामने वाले सज्जन की उपस्थिती उसकी वाणी बांधे थी| वरना् अब तक दो-चार गाली बेटे को दे देता| शायद एक-दो झापड़ भी टिका देता|
        सुबीर ने इस बार पहली बार देखा कि दूसरी तरफ का दरवाजा वो जितनी बार बंद करता हैं उतनी बार वो खुला मिलता हैं| पहले तो उसने यही सोचा कि" होगा, इस कोच में उसका परिवार ही तो नहीं हैं और लोग भी तो चल रहे होगे? "पर ढलती रात और प्लेटफार्म के अंधेरे ने उसे थोड़ा सचेत किया| इस बार सुबीर का बिगड़ा चेहरा देख इरा भी बाहर की ओर बेटे को पकड़ने गयी|मौका मिलते दो-चार धौल जमाने को भी|
            अभी वो बेटे के पास पहुँची ही थी कि" अरे!! अरे!!!!पकड़ो!! पकड़ो, की आवाज उनके ही कूपे के अंदर से आयी|उसे सुन सुबीर, इरा अपने बेटे को ले अंदर की ओर भागे| वो सज्जन खिड़की के बाहर किसी का हाथ पकड़ने की कोशिश कर रहे थे| मगर वो हाथ उनकी पकड़ से छुट गया|
      इरा-सुबीर समझ न पाये कि हुआ क्या?
"आपका पर्स ले उड़े" जब श्रीमान शर्मा ने बताया तो इरा तो वही जमीन में पसर गयी|
यहाँ "हाय दईया" वाला विलाप तो नहीं किया उसने पर सिर पर बार-बार हाथ मारने लगी| सुबीर की बरदार्शत की क्षमता अब खत्म हो गयी| गाढ़ी कमाई का पैसा यूँ हाथ से निकल गया| "जरा पर्स अपने साथ ही रख लेती तो क्या जाता? मोटी बुद्धि हैं कहाँ से शऊर आता"
सुबीर का बेटा सहम कर एक कोने में लग गया| उसे अच्छे से मालूम था कि अब उसकी बारी हैं|
         

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