दूसरी किस्त

चूकिं उन साहब के आगे केवल बरर्दाशत के कोई चारा भी नहीं रह गया| थोड़ी देर खिड़की के बाहर तकने लगे| वो डिब्बा पहली श्रेणी का तो था| पर वातानूकुलित नहीं| आजकल इस तरह के डिब्बे बनने बंद हो गये हैं|
     खैर, खेत-खलिहान से उनका मन जल्दी ऊब गया| अब क्या करे? सो वे किताब खोल कर बैठ तो गये| पर बीच-बीच में बच्चो और माँ के बीच होती नोकं- झोंक से उनका ये प्रयास भी बेकार रहा| किताब से सिर उठा वे बच्चो को घुर लेते| थोड़ी देर शांति बनी रहती पर फिर वही फुहड़पना| गोया घर के बैठकखाने  में बैठे हो|
      उन साहब का बिल्कुल मन ही न हूआ कि सुबीर से बात की जाये| बात करने से बच्चे ज्यादा बेतकलूफ हो उनकी सीट पर कुलांचे भरने लगते| सुबीर ने बात करने की कोशिश की तो हाँ, हूँ तक उन्होंने अपने को सींमित रखा|
  इरा को इतनी चौड़ी खिड़की से बाहर के नजारे देख लेने में खुब मजा आ रहा था| सो वो सफर के शुरु  से ही खिड़की पर डटी थी| दिन ढल कर रात में तब्दील हो रहा था|
   सामने के श्रीमान शर्माजी( टी़टी के आने से नाम का खुलासा हुआ)पूरी सीट पर फैल कर सो रहे थे| इकेले करते भी क्या?
    सुबीर के बड़े बेटे को रेल की पटरियों को ही निहार लेने में बड़ा मजा आ रहा था| सो वो गाड़ी के रुकते बार-बार कूपे से निकल पटरियाँ निहारने बाहर भाग जाता| सुबीर को उसके पीछे जाना पड़ता| कही पटरी देखने के चक्कर में पटरी पर ही न गिर जाये|
      रात के ९.३० बज चुके थे| सुबीर का परिवार खाना खा फारिग हो चुका था| सोने का समय हो चला था| पर सुबीर के बड़े लड़के के सिर से पटरी देख लेने का जूनून उतरता न था|
     एक बार टे्न रुकने पर वो कूपे के गेट की तरफ भागा|

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