एक सफर ऐसा भी

दर्द कुछ यूँ भी नहीं टिकते
आजकल मेरे पास,
जिदंगी को मना लिया हैं मैंने
अपने साथ जीने के लिये|

सुबीर, इरा और बच्चो को ले शायद पहली बार पहली क्लास में सफर कर रहा हैं| उसका बहूत मन था कि एक बार वो इरा को पहली श्रेणी से सफर कराये|
    मध्यम श्रेणी के व्यक्ति की आय होती ही कितनी है? तिस पर सुरसा की तरह मुँह खोले महँगाई|पर सुबीर ठाठ से जीवन जीना चाहता था|ऐश से रहो, कल किसने देखा हैं? बजट-वजट के चक्कर में सारा जीवन होम कर दो| ये कहाँ की समझदारी हूई भला?
      उसकी ये सोच इरा को परेशान नहीं करती थी| इस मामले में वो अपने मिंया के सुर में सुर मिलाती थी| श्रीमती पांचाल के पति को देखो!! हर समय एक-एक पाई जोड़ते दिखते हैं|
      सो, यहाँ बात रेल के पहली श्रेणी की हो रही थी| साफ-सुथरा कूपा और चौड़ी सीटे| और क्या चाहिये? सुबीर के बच्चे खुश थे| एक-एक चीज पर हाथ फिरा कर उसे महसूस कर रहे थे जैसे|
     सुबीर गर्व से भरा जा रहा था| बार-बार बच्चो को हलकारा लगा रहा था, " अच्छा हैं न!! देखो ये सीट कितनी चौड़ी हैं|ये देखो पढ़ने के लिये लैम्प!! सुबीर सीट के ऊपर लगे लैम्प को बार-बार खोल -बंद कर बच्चो को दिखाने लगा| बच्चो के लिये ये नयी चीज थी| उनके लिये ये खेल हो गया|
   सुबीर खींसे निपोड़ रहा था| पर सामने बैठे साहब पर नजर पड़ते ही ," बच्चो इससे मत खेलो| खराब हो जायेगा| फिर सामने बैठे अंकल हमसे इसके पैसे लेगे"कह सुबीर जबरन हसँने लगा|
     सामने बैठे सज्जन कुढ़े जा रहे थे| सफर लंबा था और उनका इस सफर का तो सत्यानाश हूआ समझो|

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