क्यों साबित कँरु अपने को हमेशा,
मैं कुछ कँहू तो कँहू ही क्यों,
मैं सहूँ तो सहूँ ही क्यों,
विन्रमता की पुछ कहाँ, सज्जनता हैं मूक यहाँ,
स्नेहस्कित प्रपंच सा,तेजाब सा जला रहा,
भभक उठो,भड़क उठो,
प्रंचड आग सी तुम जलो,
हूमक उठी उत्तंग, उत्कंठ सी,
आजाब को ये क्यों सहूँ,
बंदिशे तमाम हो,कही तो मेरा नाम हो|
उठो,उठो ऐ मोहिनी,
उठा के अपनी लेखनी,
उगा दो चाँद सब्र का,लपक लो सूरज अभ्र सा|

बेहिसाब यादे हैं जेहन में,
एक भूलने निकलु तो सौ जेहन में उतरती हैं|

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