हर्फ चटकते है मन की धूप में
आज मैंने भी टांगी हैं मन के तारो पर,
कुछ ख्वाहिशे,कुछ ख्वाब,
चटकती धूप सी रोशनी भरने के लिये,
भरने के लिये कुछ नमी,
सुखती सी जिंदगी में|
आज मैंने भी किसी कदमो की आहट नापी हैं,
आज मैंने भी घोले हैं कुछ पोशिदा रंग,
अपनी बेनूर,बेरंग कैनवास पर,
मन की डोर को आज कुछ ढीला छोड़ा हैं,
ख्वाबो को हकीकत बुनते आज जाना हैं,
मेरे तुलिका ने आज उकेरी हैं,
आज कुछ हर्फ उकेरे हैं खाली जिदंगी में,
पाकीजा पन्नो पर कुछ नूरानी तस्वीरे,
एक नज्म बांधी हैं आज अपने मुफीद सफर की,
जाने कितने हौसले जो सोये थे कितने ही पहर,
उन्हें आज ही पहनाया चोला गैर मगलूबी का|
आज उन ख्वाबो में कुछ ऐसा नूर बरसा हैं,
लगा जैसे इस तेज धूप में अकेली नहीं हूँ मैं|
अंजू निगम
देहरादून
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