विभा का ये रौद्र रुप बाई विरले ही देखती| और जब उसका ऐसा रुप बनता तो बाई मुँह सिल सारा काम चुपचाप निपटा देती| फिर आज तो उसे पैसो की सख्त जरुरत हैं| एक विभा का ही घर बचता था जहाँ वो पैसे पाने की उम्मीद कर सकती थी| बाकी सारी मैडम महँगाई का रोना ले हाथ खड़ा कर देती|
जब बाई चलने को हुई तब ही विभा का ध्यान गया उसके पैरो की ओर| उसका एक पैर चोट खाया लग रहा था|
" आया होगा इसका आदमी पी-पाकर|पीये हुये आदमी के आगे जुबान चला दी होगी|"
जिसका नतीजा विभा उसके हाथ-पैर में लगी चोटो से साफ दिख रहा था|
पर आज विभा ने सब देखा, अनदेखा कर दिया| उसका मन विक्षोभ से भर उठा| कितनी तो बार देव की बेखबरी में वो, उन बदबुदार गलियों में बाई के पियक्कड़ पति को समझाइश देने चली गयी थी|नतीजा क्या हुआ|सिफर
बाई चली गयी तो आज बड़े दिनो बाद अपने लिये फुरसत के दो पल मिले| सो, आज वो उन सारे रिश्तेदारो और दोस्तो को फोन लगाने बैठी जिन्हें अपनी व्यस्तता के चलते वो बिसार बैठी थी|इनमें ज्यादातर के शिकायत भरे इसरार अब खामोशी में बदलने लगे थे|सबकी" छोड़ो जब देखो तब व्यस्त रहती हैं| कभी अपनी तरफ से याद ही नहीं करती हैं|" ये सोच शुरु हो रही थी|
आज अपने लिये छीने गये वक्त में विभा यही सब सोचने बैठी|" समाज में रह कर भी उसने अपने को सबसे काट लिया हैं| और इस तरह कट कर रहने से उसके हाथ केवल भयावह सन्नाटे के अलावा आया भी क्या?क्यों रह रही हैं वो इस तरह?"
उसे याद आया कि इनमें से कितने ही दोस्तो से बात कर वो अपनेपन से भीग उठती थी| फिर अब इतनी उदासीनता क्यों? अपने खाली वक्त में वो पूराने गीत सुना करती थी, जो उसको सुकुन से भर देते थे| फिर वो एक नये जोश, नयी उम्मीद के साथ जीवन की शुरुआत करती थी| अब क्या हुआ?
उसने तो अपने को स्कुल, पति, बच्चो, घर की रेलम-पेल में इतना उलझा लिया कि उससे अलग उसने अपना जीवन ही बिसार दिया|
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