बाई भी मोटी चमड़ी की थी| विभा की बाते सुनती रही| उसका भावहीन चेहरा देख विभा को खिसियाहट हो गयी|
" अब बाहर खड़ी हो टाइम क्यों खराब कर रही हो| अंदर चल कर काम निपटाओ" विभा खीज कर बोल उठी|
" दीदी, आज मुझे किसी जरुरी काम से बाहर जाना हैं| कल आ सारा काम कर जाँऊगी जो आप कहेगी|" बाई ढीठ बनी डयोढ़ी पर टिकी रही|
" तो आज क्यों मुँह दिखाने चली आयी" विभा का मन कसैला हो गया| " काम करना नहीं, सुबह खराब करने चली आयी" विभा बुदबुदायी|
" दीदी मुझे थोड़े पैसे दे दो| पगार में से काट लेना|" बाई वही बनी रही|
" तुने क्या सोचा यहाँ कुबेर का खजाना गड़ा हैं या पैसो का पेड़ लगा रखा हैं? जब चाहे जितने चाहो तोड़ लो| काम नहीं करना तो महीने के आखिर में आ जाना| तेरी तरफ जो रुपये निकलते हैं वो दे दूँगी", विभा खीज गयी|
विभा की इस बात ने असर डाला| बाई थोड़ी नरम पड़ी| " दीदी आप तो नाराज हो जाती हैं| रुपये की जरुरत न रहती तो कभी न माँगती| गरीब हूँ इसलिये हर कोई सुना देता हैं|" बाई ने पैंतरा बदला|
" ये गरीबी का रोना कही और जाकर रोना| मुझसे उड़ने की कोशिश कर रही हैं| तेरी सारी गरीबी की खबर हैं मुझे|" विभा आज कठोर हो गयी|
" जितना इन लोगो का सोचो उतना सर चढ़ती हैं|" विभा का मन खराब हो गया|
" आपका झांड़ -पोछा और बरतन कर देती हूँ| बरतन कर देती हूँ| बाकी काम बाद में आकर निपटा दूँगी|" बाई नरम पड़ती बोली|
आज विभा भी जिद पर उतर आयी| सारा काम निपटा कर ही जाने देगी| सारा काम हुआ तो आदत के अनुसाक विभा का मन पिघलने लगा औक चलते उसने कुछ रुपये बाई के हाथ में थमा ही दिये|
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