दूसरी किस्त

विभा जस की तस पड़ी रही| देव भी जब नहीं होते हैं| तो ऐसा लगता हैं जैसे कोई काम ही नहीं हैं| खाना बना लेने की भी कोई चिंता नहीं| वो अकेली प्राणी कितना खा लेगी?
         आजकल जब देव नहीं होते तो उसे ऐसी ही उदासीनता घेर लेती हैं| शाम तक यूँ ही पड़ी रही| फिर उठ उसने बाई को फोन लगाया| उठना था नहीं| ये वो जानती थी| " कभी बाई सुन नहीं पाती, कभी बैंलेस नहीं होता आदि आदि, जाने कितने बहाने गढ़ लेती हैं| हमें निरी मुर्ख समझती हैं|"
      विभा को क्षोभ हो आया| " इस बार जरुर पैसे काटुँगी| हमेशा दया आ जाती हैं| पता नहीं उसकी गरीबी पर या अपनी मजबूरी पर| कमबख्त मौके का फायदा उठाती हैं| बोलो तो अपने दुखड़े सुनाने बैठ जायेगी| गोया सारा दुःख यही समेटे बैठी हैं|"
    झक बार विभा ने सारे बरतन निपटाये| क्या पता कल भी मैडम का मन न बने?
    दूसरे दिन विभा का मन ही नहीं हुआ स्कुल जाने का| काम का ढेर लगा था| फिर उसकी काफी छुट्टियाँ बची हुई थी|बच्चे पास रहते थे तब अक्सर बच्चो की हार- बीमारी में छुट्टी लेनी पड़ती|या कभी बच्चो की छुट्टी होती तो वो भी स्कुल से गुल्ला मार लेती| बच्चो के साथ कही घुम लेने का प्रोग्राम बन ही जाता|पर अब दोनो बच्चो का सामंजस्य ही नहीं बैठता छुट्टियों का|
    कमर में चुन्नी का पल्लु खोंस वो काम करने की तैयारी शुरु ही करने जा रही होती हैं कि दरवाजे की घंटी बज उठती हैं|
" इस वक्त कौन होगा? अगर स्कुल जा रही होती तो अभी उसका स्कुल
जाने का वक्त हो रहा होता!!!!"
दरवाजा खोलने पर सामने चिर प्रतीक्षित चेहरा नजर आया|सामने बाई खड़ी थी|उसे देख विभा को सुकुन भी मिला| गुस्से का उबाल भी आया| इस बार उसके चेहरे पर छायी मुर्दानगी विभा को जरा विचलित न कर पाये|
" आ गयी महारानी!! आपको फुरसत मिल गयी आने की| अभी दो-चार दिन और आराम कर लेती| काम कौन सा भागा जा रहा था" विभा बहुत मुलायम स्वर में एक-एक शब्द पर जोर देती कह रही थी|
      बाई भी कम न थी| उसको पैसो की जरुरत थी| उसे अच्छे से मालुम था कि अभी विभा का स्कुल जाने का वक्त होता हैं|ज्यादा पीछे पड़ने पर अपनी जान छुड़ाने के लिये विभा कुछ तो दे ही देगी| पर आज उसका पांसा उल्टा पड़ा|
   विभा ने सोच लिया कि रोज की किचकिच से अच्छा आज इनका निपटारा कर ही दूँ| दया कर के भर-भर के कपड़े दे देती हूँ| खाना भी देती हूँ| उसका कोई मोल नहीं| अभी बाहर एक कप चाय पाने जाये तो १०/- से कम की नहीं बैठेगी| आज विभा हिसाब-किताब पर उतर आयी थी|
   " फोन नंबर क्यों दिया जब उठाने की आदत ही नहीं| तुम लोगो की चाले मैं बखुबी समझती हूँ" आज विभा दरवाजे पर ही सारे फैसले कर लेना चाहती थी| उसका ऊँचा स्वर कितने घरो के रास्ते नाप रहा होगा, इसका विभा को आज भान न था| आज सारा क्षोभ निकल रहा था विभा का|

  

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