जीवन और भी हैं

विभा स्कुल से थकी मांदी आई| किचन में बरतनो का ढेर लगा देख उसे कोफ्त हो आई|
" आज भी मैडम का अता-पता नहीं| गर्मियों में गई बिजली की तरह हो गई हैं| एक बार गई फिर ठिकाना नहीं कब वापस आयेगी?"
    किचन से मुँह मोड़ वो अपने कमरे में आ निढाल हो बिस्तर में पड़ गयी| फिज्र से खाना निकाल गरम करने की भी उसकी हिम्मत नहीं हुई| आज सुबह का बसेड़ा खाने का भी उसका मन न हुआ|
" क्या रोज वही दाल-चावल!!!!!! कुछ चटपटा खाने को उसकी तबीयत पर विराम लग जाता था| बाहर का खाने से हमेशा उसकी तबीयत खराब हुई हैं| आज तो देव भी शहर में नहीं हैं|बीमार भी नहीं पड़ सकती अभी तो वो"
    विभा ने भुखे ही सो जाने का मन बना लिया|बाहर की चिलचिलाती धुप में वैसे भी उसका दिमाग भन्ना गया हैं| आज कौन पुछेगा भी कि उसने खाना खाया या नहीं| अभी उसका बच्चा होता तो जिद कर एक-दो रोटी पेट में डलवा ही देता| बच्चो को याद कर उसका मन भर आया|
    विभा एक स्थानीय स्कुल में पिछले १५ सालो से अध्यापिका के रुप में कार्यरत हैं| तनख्वाह अच्छी हैं|जब उसके खुद के भी बच्चे पढ़ते थे तब कितने कगार आये, कितने उतार-चढ़ाव आये, कि कल नौकरी छोड़ ही देनी हैं| पर जैसे-तैसे वो समय भी गुजर गया| आज जब बच्चे बाहर निकल गये, पति ऑफिस में व्यस्त हो गये,तो उसे अपना काम पर लगे रहना सार्थक लगा|खाली बैठ मन और कुंठित हो जाता|
     वो समय तो निकाल लिया| पर जब से बच्चे भी चले गये| उसे दुनिया एकदम खाली सी लगने लगी हैं| शरीर  के साथ मन भी अब थकने लगा हैं| कोई चीज बनाये तो किसके लिये या कोई सामान लाये तो देखने-निहारने वाला भला कौन हैं? सबमें एक अल्पविराम सा लग गया हैं|
     उसका ध्यान भटक कर फिर बाई की तरफ चला गया| पैसे फेकंने पर भी कोई ढंग की कामवाली नहीं मिल पा रही| कामवाली का सोच उसका मुड फिर उखड़ गया|

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