बीते हुये दिन

किसी कवि ने क्या खुब कहा हैं:

तुफानी लहरे हो,
अम्बर पर पहरे हो,
पुरवा के दामन पर दाग बहुत गहरे हो,
सागर के मांझी मत मन को तू हारना,
जीवन के क्रम में जो खोया हैं, पाना हैं,
पतझर का मतलब फिर बंसत आना हैं|
  
सुबीर एक मल्टी नेशनल कंपनी में कार्यरत हैं|बैंगलोर में उसकी पोस्टिंग हुई हैं| पहली पोस्टिग हैं और कंपनी से अभी जुड़ा हैं तो जाहिरी तौर पर उसे खुब मेहनत करनी हैं कंपनी में अपनी जगह बनाने के लिये|
     खैर, उस दिन भी रोज की तरह वो थोड़ी देर से ही घर के लिये निकला,साथ में उसका बेंच मेंट अरुण भी है| दोनो मैसुर के रहने वाले हैं| अकेले हैं और दोनो को घर जाने की कोई जल्दी नहीं|
     मौसम बड़ा सुहाना हो रहा हैं| वही बारिश होने के पहले वाला| खुब ठंडी बयार चल रही हैं| इस मौसम ने दोनो के मन से काम के बोझ को हटा थोड़ी देर अपने लिये जी लेने का आमंञण दिया हो जैसे|
     दोनो थोड़ी दूर बने टप्पर वाली चाय की दुकान में बैठ गये| इस तरह बैलोस बैठे शायद बरसो हो गये थे सुबीर को| यहाँ की चाय बहुत मशहुर थी वैसे भी| चाय की चुस्की के साथ बातो का सिलसिला भी शुरु था|
बाते होते-होते चाय की तरफ मुड़ गयी| चाय वाकई में लाजवाब बनी थी|
    चाय पहनावे से मगर यहाँ के नहीं लगे सुबीर को|चेहरा उनका झुर्रियों से भरा था| सुबीर को बड़ी उत्सुकता हुई उनके बारे में जान लेने की| वैसे भी दूसरो के जीवन को जानने की सुबीर की उत्कंठा हमेशा बनी रहती हैं| फिर इन बुर्जुग का पहनावा खुद आंमञण दे रहा हो जैसे|
" आप तो इधर के नहीं लगते?" सुबीर पुछ ही बैठा|
" हाँ, साहब हम तो राजस्थान के रहण वाले हैं|बीकानेर से थोड़ी दूर पर हमारो गांव हैं|" बुर्जुग बोले|
" तो आप इतनी दूर कैसे आ गये?" सुबीर सब जान लेना चाह रहा हैं|
" आप पहले साहब हो जिसने माहरी कहानी पुछी| कहानी जरा लंबी हैं साहब| आपके पास टैम नहीं होगा" बुर्जुग बोले|
" आप कहे| हम सुन रहे" सुबीर ने कहा|
बुर्जुग उनके पास ही जमीन में बैठ गये|

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