चौथी किस्त

माँ का नंबर मिलाते उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था| जाने उधर से क्या जवाब मिले?ठीक भी तो हैं|
   सुचिता का भाग्य रहा कि फोन माँ ने ही उठाया|
" माँ, मैं आपकी सुचि बोल रही हूँ|मुझे माफ कर दीजिये| मैंने बहुत गल्त किया|"माँ की हैलो सुन कर ही सुचिता भावुक हो उठी| इतनी देर बांधा सब्र सब भरभरा के बह निकला| सुचिता बेतरह रो पड़ी|
    माँ कुछ कठोर सुना भी देती पर सुचिता का रोना सुन माँ का कलेजा पसीज उठा|
   तब भी वे अपने स्वर को भरसक साध कर इतना तो कह ही गयी," तुझसे तो ताउम्र बात न करने की ठानी थी| तुने जो किया उसके बाद तो ये एकदम सही कदम था| पर माँ हूँ मैं तुझे रोता नहीं देख सकती ये जानती हैं तु भी| पर पापा भी तुझे माफ कर पायेगे ऐसा मुझे नहीं लगता|"
   " हाँ माँ मैं मानती हूँ| कि मुझसे गल्ती हुई हैं| पर गल्ती बच्चो से ही होती हैं|" सुचिता की हिचकियाँ बंध गयी|
    इधर माँ ये सोच रही थी कि इतनी रात गये सुचिता फोन कर रही हैं| और बेतरह रो रही हैं| क्या अंकित उसको आश्वासन भी नहीं दे पा रहे? पीछे से किसी और के बोलने की तो कोई आवाज नहीं आ रही| सब ठीक तो हैं?
आखिर को माँ ने पुछ ही लिया," क्या अंकित घर पर नहीं हैं| जो तु इतने इत्मीनान से बात कर रही हैं|"
    माँ का इतना कहा सुचिता को वतर्मान में ले आया| उसने अपना सारा हाल माँ को कह सुनाया और फफक पड़ी|
   सुचिता का ये हाल देख माँ का कलेजा चीर गया| पर सुचिता भी जानती थी कि माँ का कोमल मन पिघल सकता हैं| पर पापा उसे कभी माफ न करेगे| उनके आगे माँ बेबस हैं|
        माँ की आवाज ने ही सुचिता के अंदर खुब तसल्ली भर दी| ये हिम्मत भी दी कि आगे जो आना हैं उसका उसे डट कर मुकाबला करना हैं| जब दर्द हद से ज्यादा तारी हो जाये तो उसको सह लेने का साहस भी आ जाता हैं| ये सुचिता ने महसूस किया|
    माँ से बात हो जाने बाद उसे कुछ राहत मिली| पर सारी रात उसकी चहल-कदमी में ही बीती|
सुबह तड़के फोन की घंटी ने ही उसकी नींद तोड़ी| बेवक्त आये इस फोन से उसका मन अंजानी आंकाक्षा से कांप उठा|
   उधर से अजनबी आवाज आयी," क्या आप सुचिता रॉय बोल रही हैं?"
  "हाँ, मैं सुचिता रॉय ही बोल रही हूँ" बोलते सुचिता की जुबान लड़खड़ा रही थी|
" मैं एक हितेषी बोल रहा हूँ| आपके पति को यहाँ अस्पताल में भर्ती करवाया गया है| कल रात उनका एक्सीडेंट हो गया था| सवेरे होश आने पर आपका नंबर बताया|" वे सज्जन एक सांस में ही अपनी पूरी बात कह गये|
  सुन सुचिता के हाथ-पैर ढीले पड़ गये| थोड़ी देर तक तो उसके मुँह से कोई आवाज न निकली|
" हैलो!!!!!!! क्या आप सुन रही हैं?" उधर से कहा गया|
सुचिता ने अपने को संभाला और अस्पताल का पता-ठिकाना पुछा|
फोन रखने के बाद उसने अपने को संयत किया|
" अब सब तुझे अकेले ही संभालना हैं| हिम्मत से काम लो" ये कह उसने अपने आप को ही हिम्मत दी|

CONVERSATION

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