तीसरी किस्त

मोबॉइल उसका ठीक था नहीं कि गुगल सर्च या नेवीगेटर जैसे ऐप्स डाल वो अंकित के ऑफ्स पहुँच पाती|
   उसका खुब रो लेने का मन हुआ| कुछ तय कर लेने की स्थिती में वो थी नहीं| फिलहाल रात गुजरने के इंतजार के अलावा उसके पास कोई चारा भी नहीं था| उसकी जान हलक में आ अटकी| पहले कभी ऐसे हालातो का उसने सामना नहीं किया था| हजार मनौतियाँ मान ली उसने|
    उसने फोन उठाया| फोन में अभी भी कड़कड़ाहट थी| पर इतना शोर नहीं कि बात न समझ आ सके| बाहर बारिश भी रुक चुकी थी| उसने अकिंत को फोन मिलाया और पूरी घंटी जाने तक इंतजार किया| फोन नहीं उठाया गया| तो उसने दुबारा नंबर डॉयल किया| पर नतीजा वही सिफर| उसका मन बुरी आशंकाओ से घिर गया|
   उसने घड़ी देखी| अब ऑफिस फोन करना बेकार था| इतनी देर तक वहाँ मिलता कौन? नीचे चौकीदार के केबिन का नंबर उसके पास था नहीं|
     उसने फिर एक बार अपने को कोसा," कितने से लिया हैं उसने हर चीज को|"
    मन ही मन अपने से वायदे किये
कि" बस एक बार अंकित घर आ जाये फिर में सारे नंबर एक डायरी  में उतार लूंगी|आस-पास के लोगो से बातचीत का सिलसिला शुरु करुँगी| माँ चाहे जितना गुस्सा हो पर उनके पास जरुर एक बार हो कर आऊँगी|मैं खुब अच्छी बन रहूँगी| अंकित को भी शिकायत का कोई मौका नहीं दूँगी|"
     पकौड़ी का घोल वैसा ही पड़ा रहा| चाय बना पी लेने का भी उसे मन नहीं हुआ| चाय की उसे ऐसी तलब लगी थी कि आज चाय न होने से उसका सिर दुखने लगा|दिल में हौल उठ रही थी| ऐसे में चाय उसके हलक के नीचे कैसे उतरती?
      अंकित को एक बार फिर फोन करना बेकार गया| आखिर अंकित फोन क्यों नहीं उठा रहा| मन बुरे ख्यालो से भरता जा रहा था| दो बोल तसल्ली के देने वाला भी तो कोई नहीं था|
         कुछ न समझ आने पर आखिर उसने माँ को फोन मिला दिया|
   
      

CONVERSATION

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