सुचिता का मन ये सब सोच भारी हो उठा| काश अंकित अभी उसके पास होते तो उससे अपना दर्द बांट लेती| अंकित की सोच बनते घड़ी की तरफ उसकी नजर गयी|
" ओह!!! अंकित आते ही होगे|छाता भी नहीं ले गये| जाने कैसे भीगते-भागते आये|"
सुचिता ने जल्दी से मोमबत्ती जलायी| वैसे भी गोधुली हो चली थी और गोधुली में सोने और अंधेरा न रहने की आदत मायके से ही पड़ी थी| ये कुछ रस्में निभाते उसे बड़ा संतोष रहता था| कुछ तार तो मायके के उससे जुड़े ही थे| वो फटाफट पकौड़ी की तैयारी करने लगी| अंकित को भी बारिश के दिनो में गरमा-गरम पकौड़ी बहुत भाती थी|
बारिश अभी भी हो रही थी| सब करते-कराते आधा घंटा निकल गया| अंकित अभी भी नहीं आ पाये थे| "ऑफिस की तरफ बारिश तेज होगी| रुकने पर ही निकले होगे| फोन तो खराब पड़ा हैं| मोबॉइल भी खराब पड़ा हैं| उसे बताते कैसे?"ये सोच कर सुचिता ने अपने मन को समझा लिया|
जैसे-जैसे घड़ी की सुईयाँ आगे खिसक रही थी सुचिता का मन छोटा होने लगा था| "कैसे और किससे पुछे?" यहाँ तो वो किसी को ढंग से जानती भी नहीं|
सुचिता रह-रहकर अपने को ही कोसे जा रही थी| "अपना मोबॉइल ठीक करा लेती तो कम से कम अंकित उस पर फोन कर सकता था|और आलस में पड़ी रहो| किसी से बात भी नहीं कर सकती क्या मैं? इतना गुरुर आ गया मुझमें? एक नबंर की बेवकुफ हूँ मैं| क्या अंकित के ऑफिस के किसी सहकर्मी का नंबर नहीं ले सकती थी मैं"|
अकिंत तो दो-चार दोस्तो को घर लेकर भी आया था| पर उनकी बीवीयों के नंबर ले लेने का भी तो सुचिता को ख्याल न आया|अब पड़ी रहो अकेले|
शाम ढल कर रात में बदलने लगी| सुचिता की बहदवासी बढ़ती जा रही थी| क्या करे?किससे बात करे? सिवाय इंतजार के और कोई चारा भी तो नहीं था|
" बहुत शौक था न अकेले रहने का| अब बनी रहो अकेली?" घबराहट में हाथ मसलती सुचिता अपने को कोसे जा रही थी|
एक बार ये भी मन हुआ कि छाता ले अंकित के ऑफिस जा देख आये| पर ऑफिस कहाँ था|इस बारे में क्या कुछ भी सुचिता को पता था? दिशाहीन हो वो कहाँ जायेगी? अब तक अंकित के ही साथ उसने शहर देखा था| अंकित के साथ एकदम बेफिर्की के आलम में घुमी थी| कौन सा रास्ता कहाँ निकलता हैं ये जानने की उसने तनिक उत्सुकता न दिखायी थी|
अंकित कई बार मजाक भी करता" अरे!!!! अपने शहर को पहचान तो लो| अब आपको यही रहना हैं| किसी दिन खो गयी तो घर कैसे वापस आओगी"?
बात मजाक में उड़ जाती| माँ और अंकित के रहते उसने अपने को एकदम आश्रित बना लिया था|
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