सुचिता

बाहर झमाझम बारिश हो रही थी|आसमान काले बादलो से ढका हुआ था| रह-रह कर बादल कड़कड़ा रहे थे|दिन में भी रात सा अंधेरा छाया था|जल्द बारिश रुकने के कोई आसार नजर न आ रहे थे|
       सुचिता घर में अकेली थी|  ऐसा मौसम उसे बेतरह डरा रहा था|अंकित तो शाम तक आते| निपट अकेले रह लेने की सुचिता की आदत बन नहीं पा रही थी|ऐसे विकराल मौसम में तो बिल्कुल नहीं|
        अपना दिमाग दूसरी तरफ लगा लेने का कोई तरीका भी तो नहीं था| मौसम के मिजाज बदलते ही बिजली ने भी नखरे दिखा दिये थे| कही शायद ट्रासंफार्मर फुंक गया था| अब बिजली लंबे चली गयी थी|फोन में इतना शोर था कि किसी से बात कर पाना मुमकिन नहीं हो रहा था|
     आज उसे ऐसा लग रहा था मानो इतनी बड़ी दूनिया में वो नितांत अकेली पड़ गयी हो|निपट अकेली ही तो रह गयी थी वो जब से उसने अंकित को अपने जीवन साथी के रुप में चुना|
     आज उसे माँ की बेतरह याद हो आयी थी|ऐसे बरसते पानी में उसके मायके में एकदम उत्सव सा माहौल हो जाता| सुचिता का सयुंक्त परिवार था| बच्चो की टोली मिल घर भर में धमा-चौकड़ी मचाती| कभी कागज की नाव बना पानी में तैरा देना, कभी भरे पानी में उछाले मारना या न हो तो बारिश में भीगने ही निकल आना|
  जब सब हलकारे जाते तो रसोई में  जा खाने की फरमाईश करना| सुचिता को भी तो माँ के हाथ की बनी 'पोई के पत्तो' की पकौड़ी कितनी भाती थी| सब याद कर उसके होठो पर मुस्कान तिर आयी| वो यादे कितनी मीठी थी| सारा बचपन तो उसके पोर-पोर में समाया था|
     अंकित से शादी के बाद उसने उस ओर जाने की कोई कोशिश ही नहीं की| माँ की मानमनुहार  सब को ताक पर रख केवल अपने पिया की हो ली थी| इतनी निर्मोही कब से हो गयी थी वो?

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