ट्रेन का सफर बहुत किया| और अनुभव भी कम न रहे| पर कुछ किस्से ऐसे हो जाते हैं| जो यादगार रह जाते हैं|ऐसा ही एक मजेदार किस्सा मैं आपको सुनाती हूँ|
हुआ यूँ की मैं अपने दोनो बेटो के साथ लखनऊ से देहरादून जा रही थी| हरिद्वार स्टेशन पर गाड़ी तकरीबन १/२ घंटे रुकती थी| ज्यादातर याञी यहाँ उतर जाते थे| और ट्रेन के कई डिब्बे कट जाते थे|
हमारी बर्थ दरवाजे के एकदम पास थी| हरिद्वार स्टेशन में बदंरो का बड़ा प्रकोप रहता था| उत्पाती बदंर लोगो से खाने का सामान अक्सर छीन लेते थे|
हम खिड़की के बाहर देख रहे थे|कि डिब्बे में एक बदंर घुस आया|खाने का कोई सामान तो उसके हाथ लगा नहीं| इस खीज में वो मेरी एक सैडंल उठा बाहर भागा| ये इतने अचानक हुआ कि मुझे पहले समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या? जब अहसास हुआ तब तक वो मेरी सैडंल ले प्लेटफार्म के शेड में ऊँचे जा बैठा|
मैनें शोर मचाया कि किसी तरह वो मेरी सैडंल नीचे फेंक दे| ट्रेन के भी चलने का समय हो चला था|
मेरे शोर मचाने पर बदंर का तो नहीं पर प्लेटफार्म पर खड़े कई लोगो का ध्यान आकर्षित हुआ| एक सज्जन मेरे पास आये| और बोले," आपके शोर मचाने से बदंर डर जायेगा और कभी सैंडल नहीं छोडे़गा|"
उन्होने अपने धोले से एक केला निकाल बंदर को दिखाया| पर मुआ बदंर तो मेरी सैंडल वही छोड़ केला लेने नीचे आ गया| मेरी समस्या तो जस की तस रही|
बिन पैसो के तमाशा हो रहा था| और कुछ लोग मजे लेने के लिये वहाँ आ खड़े हुये|हाथ बांधे तमाशबीन की तरह|
पर उसी भीड़ से निकल एक सफाईवाला आगे आया| अपने लंबे डंडे के सहारे उसने मेरी ऊपर फंसी सैंडिल निकाली| भीडय ने जोश में आ तालियाँ बजा दी|
१० मिनट चली इस पिक्चर के हीरो( बंदर) जाने कहाँ चले गये थे| साइड हीरो( सफाई वाले) की जम कर वाह वाही हुई| और इस पिक्चर का सुखद अंत हुआ| क्योंकि ट्रेन ने सीटी बजा दी थी|
मेरा ये अनुभव एकदम निराला था|
अंजू निगम
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