हाथ ही तो मिलाया था कुछ दोस्तो से,
कमबख्त दुख की लकीरे साथ ले गये|
एक लफ्ज की तरह महफुज कर लीजिए
कोरे पन्नो पर,
जो मिट गये तो फिर उकेर भी न पायेगे
मुझे|
सुखे पत्तो सी जिदंगी गिर रही हैं,
कुछ किसी पैरो तले आ गई,
कुछ वक्त ने कुचल दी|
चेहरे का अक्स औ जिस्म का लिबास,
दूनिया ने इसी पर आंका मुझको,
कभी रुह को आइना बना देखा होता|
आज जरा फुरसत में हूँ,
जरा दिल का दरवाजा खोल कर तो देखना|
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