आज बाजार खुब सजा-धजा हैं| खुब रौनक लगी हैं| और होती भी क्यों न!!!!!! दो जिन बाद दीवाली हैं| लोग पूरे जोश में खरीदारी करने निकले हैं|त्यौहार भी तो साल भर का हैं| बढ़ती महँगाई भी लोगो के जोश में कमी नहीं ला पाती|
बच्चे क्या बड़े-बुढ़े क्या!!. सबके चेहरे उत्साह से दमक रहे हैं| मगर थोड़ी ही देर में ये सारा उत्साह भयावह चीख- पुकार में बदल गया| बाजार के बीचो-बीच बने साईकिल-स्टैंड में बम का तेज धमाका हुआ था| जाने कितनी साईकिलो के परखच्चे उड़ गये| सब जगह तफरा-तफरी का माहौल|
थोड़ी देर पहले की रौनक खौफ में बदल गयी| पीछे रह गय बम से उड़े वाहन,क्षत- विक्षत शरीर और भागते लोगो की जुते-चप्पले|एंबुलेस और पुलिस की गाड़ियो के साइरन से माहौल पट गया| कितने ही हाथ आगे आये मदद को|
जहाँ बम फटा था उससे थोड़े ही फैसले पर एक कपड़े की दुकान थी|उस दुकान से सटा एक लड़का खड़ा था| चेहरा डर से स्याह पड़ गया था| दुकानदार ने लड़के को गौर से देखा| उसे इल्म न हुआ कि लड़का सामने का नजारा देख डरा हैं| या बात कुछ और हैं| सहारा दे वो लड़के को अंदर ले आते हैं| पानी पिला उसे कुछ वक्त देते हैं| लड़के का चेहरा ही स्याह नहीं पड़ा बल्कि उसका सारा बदन थर-थर काँप रहा हैं|
दुकानदार समझदार तो था ही दरियादिल भी था|लड़का अभी भी सदमे में था| इसलिये उसने कल तक रुक लेने की सोची|
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