अंतिम किस्त

उमा को याद कर सती भावुक हो जाती हैं|ये एक ऐसा जख्म लगा हैं सती को जिसकी टीस वो जिदंगी भर से ढोती आई हैं|सरदारजी भी तो ढो रहे हैं उस जख्म को आज तक|
      सती का ऑफिस आने को हैं| वो सरदारजी को देखती हैं तो पाती हैं कि वो शुन्य में टकटकी लगाये देख रहे हैं| अब सरदारजी से कुछ और पुछ लेने का उसे साहस नहीं|
     दूसरे दिन सती जब बस में चढ़ती हैं तब सरदारजी को देख सुखद आश्चर्य में पड़ जाती हैं|शायद कल काम पूरा न हुआ हो| उसे देख सरदारजी के चेहरे पर भी पहचान के भाव उभर आये हैं|
" आपकी चोट में आराम लगता हैं आज तो|" कह सती मुस्कुरा देती हैं|
  अब तक जो दर्द साझा हुये थे उसे फिर सरदारजी कुरेदना नहीं चाहते तो फिर और किस बाबत बात हो|
     पर आज उसे लगा कि शायद सरदारजी भी तो आज अपना मन बांट लेना चाहते हैं|तभी न उन्होनें पुछ लिया," आपके नाल कौन-कौन हैं पुत्तर"
     " बस मैं और मेरे पति" सती बोल उठी|
आज बस में कल की तरह धक्का-मुक्की नहीं हैं| तभी वो इत्मीनान से बैठी बात कर रही हैं| बातो का सिलसिला चला तो पता चला कि आज  जो सरदारजी मामूली सा पठानी सुट पहन बैठे हैं, एक समय करोल बाग में उनकी खुद की कपड़ो की बहुत बड़ी दुकान हुआ करती थी|दौलत, रुतबा, परिवार सब था उनका| पर ८४ के दंगो ने उनका सब छीन लिया और आज लुटे-पिटे से तन्हाई का जीवन गुजार रहे हैं|
      पोता सामने न होता तो जिस आग ने परिवार को झुलसा दिया उसी आग में खुद भी होम हो गये होते|
      पोते का ही मुँह देख उन्होनें क्या-क्या न किया| जब खाने के लाले पड़ गये तब उन्होनें चप्पल तक बेची ठेले में|
सती का मन भर आता हैं| सरदारजी ने ही बताया कि अपनी उसी दुकान को नये सिरे से चलाने की पोता कोशिश कर रहा हैं| इस सकारात्मकता को देख सती को अच्छा ही लगा|शायद जीवन फिर से जी उठे|
      सती का ऑफिस आ गया हैं| सरदारजी के पैर छु वो बस से नीचे उतर जाती हैं| ऑफिस की ओर जाते उसका मन सोच रहा हैं| कि चंद पलो का वहशीपन  कितने लोगो को जीवन भर की टीस दे गया|
     ये उन्माद, वहशीपन कब और कहाँ रुकेगा? कौन जाने|

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