वरिष्ठ मंञी की हत्या हो जाने की खबर जब फैली तब वो अपने स्कुल के आगे खड़ी बस आने का इंतजार कर रही थी|
कहते हैं न कि खबरो के भी कान होते हैं|यह बात जंगल की आग की तरह फैली|स्कुल से घर तक का सफर उस दिन बहुत लंबा लगा उसे|माँ के आँखो में समाये खौाफ को आज तक न भूली सती|शाम ढलते एक सन्नाटा पसर गया|
फिर चला खौफनाक मंजर का वो दौर| जिसे याद कर आज भी सती सिहर उठी| दो दिन चले उस मंजर ने जाने कितने परिवारो को अपने आगोश में समेट लिया|
वो तो उमा के परिवार ने खुद जिया था| इनमें अराजक तत्वो की चाँदी हो गयी| इनमें उन बेरोजगार युवको की भरमार थी जो अक्सर पान की गुमटियों में सजे मिलते|
उन्मादी भीड़ के आगे कितने बेबस, लाचार चेहरे बस अपना घर लुटते देखते रहे| जिसके हाथ जो आया वो बटोर अपना घर भरा| सती की आँखो के आगे भीड़ का ऐसा निर्लज्ज चेहरा कभी न गुजरा था| पूरा जंगल राज हो गया| जिनके घर लुटे उनका दर्द उमा और उसके जैसे कितने ही परिवारो, से ज्यादा कौन समझ सकता था|
दो दिन बाद कर्फ्यू लगा| पर तब तक कितने ही घरो ने अपने घर के चिरागो को खो दिया था| कितने अपना सब कुछ गंवा खाली हो गये थे|
उमा का घर उड़ा देने की फुसफुसाहट हो रही थी| ऐसा आलम उमा को कितना सहमा गया था ये उसके जर्द सफेद पड़े चेहरे पर सती ने पढ़ा|बगल के घर ने उमा और उसके परिवार को शरण देने से साफ इंकार कर दिया|इतने सालो के रिश्ते पल भर में मुरझा गये| तब सती के पापा ने ही सबको अपने घर टिकाया|
उस रात की काली परछाई से फिर उमा बाहर न आ सकी| न उसके परिवार के मन में विश्वास का कोई स्थान रहा|
समय शायद उनके जख्म भर देता पर एक दिन अचानक उमा अपने परिवार सहित वहाँ से चले गये| कहाँ-ये किसी को पता न था| क्यों-ये सबको पता था|
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