दूसरी किस्त

सती का मन भर सा गया|सरदारजी किसी अपनो के अपनेपन से खाली थे| ऐसा सती को लगा|
      गीले रुमाल की वजह से सरदारजी के माथे से रिसता खुन कुछ रुक गया |चोट की ठसक कुछ कम हुई थी शायद|
   इस रुट की इसी बस से सती का रोज आना-जाना होता हैं| उसके अॉफिस के एकदम सामने उतारती हैं|उसने कभी भी इन सरदारजी को  इस रुट की बस से चलते नहीं देखा |
  जाने क्यों सती को उमा की याद हो आयी| उसकी सबसे खास सहेली|उसके पापा की आँखे भी यही सुनापन लिये रहती| तब वो कच्ची उम्र की थी फिर भी चेहरे पर आये भावो को तो तोल सकती थी|
        मन में आ रहे भावो को सती ने झटक दिया| ऑफिस पहुँचने में वक्त हैं सो बातो का सिरा सती ने ही पकड़ा|
       " आपको मैंने इस बस में पहली बार देखा| नहीं तो ज्यादातर वही चेहरे देखती हूँ|" सती के स्वर में उत्सुकता हैं|
" हाँ, किसी काम से करोलबाग तक जाना हैं" सरदारजी ने नपे- तुले शब्दो में अपनी बात कह ली|
" जी!!! आपके माथे में खासी चोट आ गयी हैं| घर जा मरहम लगवा लीजियेगा" बातो का सिलसिला आगे बढ़ाने के लिये सती ने कहा|
" पुत्तर मेरे नाल कोई नहीं" ऐसा कहते सरदारजी की आँखे पनीली हो उठी|
    सती ने भी इस दर्द को महसूस किया| जैसे उसका अपना हो|
  " ८४ के दंगे में सारा परिवार खत्म हो गया| बस एक पोता बचा| उसी के सहारे अब तक जी रहा हूँ"|
   सती को लगा उसने सरदारजी के पूराने जख्मो को हरा कर दिया|उसके जख्म भी तो साझे हैं| वो अब तक मन के कोनो में दबा रखे हैं|
       सती जैसे खो गयी उस सबको याद करते|

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