आज फिर देर हो गयी| सती के पैर जल्दी-जल्दी बस-स्टॉप तक का रास्ता नापने लगे|
सुबह का एक-एक पल उसके लिये कीमती होता हैं| दफ्तर जाने की ऐसी ही रेलम-पेल से रोज उसे दो- चार होना पड़ता हैं|वियोम साथ तो देता हैं पर जाने काम का ढेर कहाँ से सिर उठाये चला आता हैं| सुबह ही से उसका तन थकावट से भर उठता हैं|
वियोम कितनी बार दोहरा चुका हैं," क्यों शरीर गला रही हो?घर बैठे भी कितने काम कर सकती हो|"
सती को मगर बाहर की जो भाग- दौड़ से रोज अकेले निपटना पड़ता हैं तो वो उसका आत्मविश्वास ही जगाती हैं| घर बैठे मन कुंद हो जायेगा|
बस स्टॉप पर लगी लंबी कतार ने उसके माथे पर बल डाल दिये| इस उम्र में आ नये सिरे से' स्कुटी' सीख चला लेने का उसके अंदर साहस नहीं| अगर गिरी तो शरीर के पुर्जे जुड़ने में महीनो लग जायेगे|
बस स्टॉप की लंबी कतार को ढेलती वो भीड़ से इतर आ कर, खड़ी होती बस में जल्दी से चढ़ जाती हैं| पीछे स्ञी-पुरुष के रोष भरे स्वर दूर तक उसका पीछा करते हैं| पर आज उसे इसकी परवाह नहीं| महानगर की इस भीड़ में छुई-मुई बनने से काम चलता नहीं|
बस में भीड़ हैं| ऑफिस ऑवर में ये रोज का नजारा हैं| उसका आधा रास्ता तो यूँ ही खड़े-खड़े नप जाता हैं|बस में किसी तरह जगह बनाती वो आगे की तरफ बढ़ जाती हैं| यहाँ भीड़ कम होती हैं| फिर मौके का फायदा उठा अपनी मनमानी करने वाले मनचलो से भी बची रहती|
आज सती की किस्मत अच्छी थी जो उसे चढ़ते साथ सीट मिल गयी|उसके बैठते साथ ड्राइवर ने जोर से ब्रेक लगाया|वो समय रहते संभल गयी पर उसके पीछे बैठे सरदारजी का बुढ़ा शरीर संभल न पाया और सामने सीट की लोहे की रॉड से उनका माथा टकरा गया| वे कराह उठे|उनके पीछे बैठे दो कम उम्र लड़के भी चोट खा गये|उन्होनें ड्राइवर को दो-चार भद्दी गालियाँ दी|
सरदारजी के माथे पर गूमड़ निकल आया था और थोड़ा खुन भी रिसने लगा था|घनी दाढी और मोटी सफेद भौहों से उनका आधा चेहरा ढक सा गया था फिर भी उनके चेहरे पर चंस्पा दर्द सती से छुपा नहीं रहा|उसने अपने रुमाल को आधा भीगो सरदारजी के माथे पर टिकाया| सरदारजी की आँखे ममता से भर उठी और स्नेह से उनका हाथ सती के सिर पर आ ऱुका|
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