दूसरी किस्त-सुमित्रा

शुरु में तो सुमित्रा को ये बहुत खला| और वो बच्चो को मीठी घुड़की पिलाती|
" क्या सारे दिन मोबॉइल से चिपके रहते हो| बाहर खेल कर आओ| शरीर की थोड़ी वर्जिश हो जायेगी| थुलथुल बदन हो जाओगे ऐसे बैठे-बैठे" सुमित्रा कह हंस देती|
     ऐसे कह देने से बच्चो से ज्यादा उनकी माँ को अखर जाता|बच्चो पर जो एकछत्र एकाधिकार था, वो भी डोलता दिखा|सो बात तुरंत बेटो के कानो में उडे़ल दी जाती| बीवी को माँ की सेवा करते देख बेटा पहले ही बीवी के आगे नतमस्तक रहता|इसलिये उसे अपनी बीवी ही सही लगती|
   "माँ,  आजकल स्कुल में भी तकरीबन सारा होमवर्क  नेट से ही लेने को बोलते हैं| सो, बच्चो को करने दिया करो उनका काम" बेटा माँ को समझाइश देता|
     सुमित्रा ने धीरे-धीरे फिर बोलना ही छोड़ दिया| सब बड़े और समझदार हो गये थे| उनमें उसकी क्या बिसात?
  पड़ोसियो से बोल लेना भी बहू को अखरता|
" जाने घर का कौन सा भेद खोल आये?" बहू की यही सोच बनती|
सुमित्रा की सारी उम्र की समझदारी यूँ तिरोहित कर दी जाती|उन्हें यही लगता कि वो कभी कुछ कर ही नहीं पाती थी|
     हाँ, कभी खाने को जीभ मचलती तो वो किचन का रुख करती| खाने की चीजो में बहू का हिसाब बहुत नपा- तुला होता था|इस मामले में उसकी गजब की याददाश्त रहती|
      उस दिन घर में खीर बनी थी| स्वादिष्ट खीर की महक सुमित्रा के नथुनो में समाने लगी| बहू खीर बनाती भी लाजवाब थी|
   बहू जब तक किचन में बनी रहती सुमित्रा वहाँ जाना टालती|बहू की घूरती नजरे उसके मन और खाने दोनो का जायका बिगाड़ देती|
       बहू के किचन से हटते ही सुमित्रा बन आयी किचन में|

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