किचन में खीर की खुश्बु फैली थी| बहू शायद नहाने चली गयी थी|
घर के सारे सदस्यों में खपने के बाद खीर उसके हिस्से आयेगी| ये अब तक का अनुभव बता रहा था|
सो, बहू के किचन से हटते ही सुमित्रा किचन में बन आयी|खीर एकदम गरम थी और सुमित्रा को बहू के वापस आ जाने से भी हड़बड़ाहट थी| शरीर बुढ़ा था और फिर ऐसे काम कभी किये न थे|
कटोरी में खीर परोसते उनके हाथ डगमगाने लगे|नतीजा ये हुआ कि जल्दी परोस लेने की अफरा-तफरी में खीर की कटोरी उनके हाथ से छुट जमीन में बिखर गयी|
सुमित्रा क्षण भर को जड़ हो गयी| बहू नहीने नहीं गयी थी| कपड़े धोने गयी थी| उसके हाथ में लगा साबुन का झाग यही कह रहा था| किचन से आई आवाज पर ये सोच भागी आयी कि कही बिल्ली ने मुँह न मारा हो|
वहाँ माँ को खड़ा , फर्श पर बिखरी खीर और एक तरफ लुढ़की कटोरी देख सारा माजरा समझते उसे जरा वक्त न लगा|बहू की त्योरियाँ चढ़ गयी| माँ की उम्र का लिहाज करना उसने कब का छोड़ दिया था|
इस आपा-धापी में कटोरी से छलक थोड़ी खीर सुमित्रा के हाथो में भी पड़ गयी थी| दर्द काफी हो रहा था| वो हाथ पकड़ हल्का करहा रही थी| पर बहू शायद इसे उनका स्वांग समझ बैठी| उस तरफ तनिक ध्यान न दे एक कटोरी खीर की बरबादी के लिये उसने सुमित्रा को इतनी खरी-खोटी सुनाई कि सुमित्रा स्तंभित रह गयी| अपने हाथो की जलन वो बिसार चुकी थी| दुख का आवेग उससे अधिक था|
आसुँओ को उसने तनिक बहने न दिया| सुमित्रा के अंदर जाने कहाँ से खुब ताकत भर आयी| उसने अपना सारा सामान समेटा और अपने 'घर 'को रवाना हो गयी| बेटे के आने का उसने इंतजार न किया| जानती थी कि उसका सिक्का खोटा हो चुका हैं| वो बहू की ही जुबान बोलेगा|
घर से सामान ले निकलते बहू ने उन्हें रोक लेने की कोई कोशिश न की| शायद मेहमानो को रोक लेने का उसके यहाँ रिवाज नहीं था|
अपने घर के आगे सुमित्रा आज फिऱ खड़ी थी| पर आज एक सकंल्प लेकर| अपने जैसी महिलाओ को सहारा देने का|
उसे यही लगा कि जिन 'अपनो' के लिये वो इतनी दूर निकल आयी थी वो तो सब यही हैं आस-पास| बस एक आवाज भर देनी हैं|
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