अंधेरो के दौर देखे हैं बहुत,
कुछ रोशनी से भी मुलाकात की जाये|
 
कोरे पन्नो में इबारत लिखी हैं बहुत,
कुछ जिदंगी के रंगो से मुलाकात की जाये|

आँखो के अश्क देखे हैं बहुत,
कुछ मुस्कुराती आँखो से मुलाकात की जाये|

शाखो से गिरते सुखे पत्ते देखे हैं बहुत,
कुछ नये पत्तो से मुलाकात की जाये|

नफरतो का भी मंजर देखा हैं बहुत,
कुछ मोहब्बत से मुलाकात की जाये|

लफ्ज आइना हैं दिल का,
दिल हंसता हैं तो लफ्ज खिलखिलाते हैं,
दिल उदास हैं तो लफ्ज भी बेनूर होते हैं,
गर दिल ने दिल लगा लिया,
तो लफ्ज भी दिल्लगी कर जाते हैं|
लफ्ज भी दिल्लगी कर जाते हैं|

वो रास्ते किस कदर जानते हैं मुझे,
कदम-कदम जिसमें चस्पां हैं मेरे,
आज वो रास्ते अजनबी लगते हैं मुझे,
कुछ मैं, कुछ वो और कुछ वक्क बदल गया हैं शायद|

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