दूसरा भाग


पढ़ाई पुरी करने के सालो बाद भी कम ही मौके आये जब मुझे कलम उठाने की जरुरत लगी|बच्चों की पढ़ाई- लिखाई के दौर में भी parents-teacher meeting में साइन करने,कभी डायरी में साइन करने के अलावा कोई दूसरा अर्थपूर्ण काम किया हो ऐसा याद नहीं आता| कभी लगता कि अब तो शायद ही कलम उठाने की कभी जरुरत पड़े| फिर उन दिनो आज की तरह विकसित मंच मिल पाना इतना सहज कहाँ था|
          वक्त ने परिस्थितियों को बदला और रचनात्मकता के कई मंच सजे| प्रोत्साहन मिला| इस प्रोत्साहन में कई चेहरे शामिल हुये जिन्होनें मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी| उनके प्रयासो के आगे मैं नतमस्तक हूँ|
      मेरी पहली रचना "अद्भुत समाचार'(लखनऊ से प्रकाशित) में छपी| वो दिन मेरे लिये बहुत यादगार रहा| वैसे भी पहला कदम हमेशा यादगार ही रहता हैं| मेरी दूसरी रचना देश के प्रतिष्णित अखबार " दैनिक जागरण"की साप्ताहिक पञिका " मधुरिमा" में प्रकाशित हुई| मेरे कदमो को दिशा मिल रही थी|
            मैं" वामा साहित्य मंच" से जूड़ी जो नयी उभरती प्रतिभाओ को प्रोत्साहित करने और लिखने के नये आयाम तय करने की प्रेरणा देते|साहित्य के क्षेञ से जूड़ी कई प्रतिभाओ से मिलने का मौका इसी मंच ने दिया|
   इस बीच मैंने" अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन" में भाग लिया| मेरे लिये लिखना जितना सहज था, सारे गुणी जनो के आगे बोलना उतना सहज नहीं था|गल्तियाँ हुई और उससे मैंने सीख भी ली|
       आजकल अपने 'blog' के अलावा' webdunia' के लिये कुछ लेख लिखती हूँ|
       मंच मिल रहे हैं तो पंख भी विस्तार पा रहे हैं|
मंजिल तय नहीं हैं| जानती  हूँ रास्ता लंबा और कठिन हैं| पर लेखन की सीमा अतंहीन हैं| इसमें कुछ सार्थक ढुंढ सकु ऐसी कोशिश रहेगी|
   आज के त्वरित विषयों पर मेरी पकड़ बनी रहे और पाठको का स्नेह और आर्शिवाद रहे तो लेखन के इस सफर के पड़ावो को पार करना सहज रहेगा|
             आप सब पाठको का आभार

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