पढ़ने का शौक तो मुझे शु्रू से रहा।मेरी माँ अक्सर कहती कि बस इसे किताब पकड़ा दो फिर इसे किसी की जरुरत नहीं।वाकई मेरा यही हाल था।पुरा कुनबा इकट्ठा होता और मै एक कोने में किताब ले बैठ जाती।किताबी कीडा़ तो नहीं कह सकते क्योकि कोर्स की किताबों से कोसों दूर भागती थी।पर प्रसंग रोचक होते तो मेरा मन खुब रम जाता।
कुछ लिखने और मन बाँटने की ये कला मैने अपनी माँ से सीखी।प्रतिष्णित अखबारो के editorial में उनका लिखा कुछ निकलता ही रहता।अखबार में अपना लिखा देख उनकी आँखों में जो चमक आती थी वो मेरे लिये बहुमूल्य होती थी।
यही कही से शायद मेरे मन में ये विचार पनपे होगें कि मैं भी कुछ ऐसा लिखु जो रोचक हो।अपने पाठको के मन तक पहुँचने के लिये ये जरूरी भी था।
अपनी पहली कहानी'पिघलता सच' 1993 में लिखी पर तब तक भाषा में जो परिपक्वता आनी चाहिये थी उसकी कमी रही।वक्त ने बहुत कुछ सिखाया।समय के साथ मुझमें और मेरे लेखन में परिपक्वता आई।
अगला हिस्सा कल के लिये।
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