दूसरी किस्त

शाम को जब व्योम घर आया तो सब सामान्य मिला| जो बम फुटने थे| उसका जरा अहसास न था उसे| चाय पी जब व्योम जब आराम से बैठा तो नेहा को टकटकी लगाये अपनी तरफ देखते पाया|
" क्या बात हैं?आज कुछ ज्यादा प्यार आ रहा हैं क्या" व्योम मसखरी में उतर आया था|
" स्नेहा कौन हैं?" नेहा बिना किसी लागलपेट सीधे मुद्दे पर उतर आयी|
इस अचानक हुये हमले के लिये व्योम बिल्कुल तैयार न था| थोड़ी देर के लिये वो सकपका गया| जैसे उसे चोरी करते पकड़ लिया गया हो|
" स्नेहा के बारे में तुम्हें कैसे मालुम?" व्योम बोल उठा|
" आपकी फेसबुक से" नेहा ने स्वर को भरसक  संयत रखा|
व्योम से बात कर उसे बहुत राहत मिली| जो नंबर वो स्नेहा का सोचे बैठी थी वो तो व्योम के रिश्ते की बहन का निकला|
   " आपको अपनी बहन के बारे में जानने की इतनी क्या उत्सुकता हो गयी कि आपने इतनी बार सर्च कर लिया" नेहा भी पक्के जासूस की तरह हर बात का खुलासा करना चाहती थी|पर ये बात वो व्योम से नहीं पुछ पायी|
    नेहा पर नया जुनून सवार हो गया और उसने सारी स्नेहा को खोजना शुरु कर दिया| सबकी तस्वीर वो व्योम के सामने रखती| पर जवाब न में मिलता| नेहा को शक भी  होता कि व्योम वाकई चाहते भी हैं कि नेहा स्नेहा के बारे में जाने|
    लगातार तीन दिन की माथा- पच्ची के बाद आखिर को वो स्नेहा निकल ही आयी जिसकी तलाश थी|
व्योम का चेहरा भी ऐसा लगा जैसे खिल उठा हो|
       व्योम के ऑफिस जाते ही वो फिर फेसबुक खोल बैठ गयी| मैडम भी गजब की थी| देखने में नहीं| मैडम ने अपना मोबॉइल नंबर डाल रखा था|
       शाम ही व्योम को चाय- नाश्ता दे वो अलग आ गयी| उत्सुकता कह लो या जो कुछ भी , उसने स्नेहा का नंबर मिला दिया|
    नेहा ने ये खुलासा न किया कि वो हैं कौन| बस यही कहा कि उसकी पुरानी दोस्त बोल रही हूँ| व्योम को लगा शायद नेहा स्नेहा से बात कर रही हैं|
      पुराना प्यार था ऐसे कैसे बिसरता|" नेहा जब इतना कुछ ढुढं ले रही हैं तो मेरा भी तो एक बार बात करना बनता हैं"अपने मन का करने को व्योम बेकार की दलील  दे रहा था खुद को ही|
  ऑफिस जा उसने फेसबुक चेक किया| और स्नेहा को ढुंढ उसके मोबॉइल पर फोन कर दिया|उसे हैरत तो ये हुई की नेहा उसकी फ्रेंडशीप लिस्ट में हैं|
" हैलो, मैं व्योम बोल रहा हूँ" व्योम के चेहरे पर चौड़ी होती मुस्कान एकदम फीकी हो गयी जब सामने से ये कहा गया|
" कौन व्योम?रॉग नंबर" और फोन कट गया|
व्योम को काटो तो खुन नहीं ऐसी हालात हो गयी| दूसरे दिन नेहा के फेसबुक से उसने अपने को अनफ्रेंड कर लिया|
   नेहा को जाने कौन सा कीड़ा काट रहा था| जो दीसरे दिन उसने स्नेहा का नंबर मिला दिया| और उससे फेसबुक से अनफ्रेंड करने का कारन पुछा|
" अतीत के पन्ने दोबारा खोलने का क्या फायदा?" उसका उत्तर था|
"अतीत के पन्ने न खोलने वाली बात हजम तो हो रही हैं|मगर मैडम के पास अब तक तो मेरा नंबर सेफ हो गया होगा| दूसरी बार फोन कर रही हूँ फिर मेरा फोन क्यों उठाया?" बिल्कुल जासूस की तरह नेहा सोच रही थी|
   आगे तो नेहा और हैरत करने वाले काम करने की सोच रही थी| और ये क्यों कर रही थी उसे खुद नहीं मालुम था|

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