सातंवी किस्त

पल्लव पीछे की बात कह उसस् लड़ लेता|उसे खरी-खोटी सुना लेता|पर ये बेर्खी उसे तोड़ रही थी| कितनी मुश्किल से तो उसे कुछ खुशी के पल मिले हैं| पल्लव ऐसा कर क्या उसे अपनी सहेलियों से ही अलग कर रहा हैं| ये सवाल सुमि को मथे जा रहा था| शैतानियों में तो तीनो सहेलियों की बराबर भागीदारी थी फिर अकेले उसे ही क्यों सजा मिल रही हैं?
     पनौती हैं न वो!!!! हर जगह मात खाती हैं| किस्मत ने हर जगह उसे मात दी|
      रिया ने बाद में बताया कि" buisness meeting निकली यार ये तो| चुकिं मेरे पति और पल्लव के पापा का एक ही तरह का कारोबार हैं इसलिये मिलने की सुरत बनायी गयी|"
    सुन सुमि को थोड़ा अच्छा ही लगा|
" मैं तो अपने पति के पीछे खसीटते हुए चली गयी समझो" रिया हसंते हुये बोली|
सुन सुमि को थोड़ा सुकुन मिला|पर आने वाले दिनो में भी पल्लव ने उससे मिल लेने की कोई पहल न की| एक दिन अचानक रिया के घर ही दोनो आपस में टकर गये| सुमि ने उससे कन्नी काटनी चाही|
" क्या आज भी नहीं पहचानती हो? शायद हम लोग साथ पढ़े थे?" पल्लव ने कुछ उपहास, कुछ बातो का सिरा पकड़ने की गरज से कहा| सुमि उसका मन नहीं पढ़ पायी|
  " अजीब आदमी हैं| उस दिन घर बुला एकदम ignore कर दिया| आज बात नहीं कर रही हूँ तो जनाब तंस कस रहे हैं|".
      " ओ होsss|शु्क्र हैं आज आपने पहचान लिया| वरना् आप कहाँ आप जैसे बडये आदमी और कहाँ हम" सुमि अपने को रोक न पायी|
" पर मैं अपने व्यहवार के लिये माफी जरुर माँगती हूँ" सुमि की आवाज में ठहराव आ गया था|
वाह!! सुमि और माफी? सपना तो नहीं देख रहा| आज तो बड़ी-बड़ी बाते करने लगी हो| पहले कभी ऐसी गंभीरता नहीं ओढ़ी" पल्लव के चेहरे पर मुस्कुराहट थी|
" माफी तो मांग ली न" सुमि कह उठी|
" माफी भी कैसे मांगी? जैसे लाठी मार रही हो| थोड़ा अदब से माफी मांगो" पल्लव को सुमि को चिढ़ाने में आनंद आ रहा था|
" रिया मुझे जल्दी जाना हैं| मैं जा रही हूँ" सुमि वही से गुस्से में बोली|
" अजीब लड़की हैं मुझे यहाँ सजा कर बैठा दिया| खुद जाने कहाँ गायब हैं|" सुमि को रिया पर भी खीज हो रही थी|
रिया तो जानबुझकर दोनो को वक्त दे रही थी|मन की भड़ास निकाल लो दोनो, भाई| उसके सामने बैठने से बात कहाँ बनती| सुमि की ऊँची आवाज में गुहार लगाने पर रिया अंदर से भागी आयी|
" तुम दोनो का मल्ल युद्ध क्या फिर शुरु हो गया| सुमि, छुट्टी वाले दिन तेरा कौन सा काम अटका हैं भला? तुम्ही दोनो के लिये पकवान तैयार कर रही थी" रिया भी कम न थी|
" जाने दो उसको| पता नहीं कितना नुकसान हो जाये| तुम्हारे पकवान मे़ैं खा लुगां" पल्लव भी सुमि की खिसियाहट का पुरा मजै ले रहा था|
सुमि रिया को एक कोने में खींच ले गयी" बच्चु, तु भी उसी के सुर में सुर मिला रही हो| मेरी गोस्त हो या उसकी"|
  " मैं तो तुम दोनो की दोस्त हूँ" रिया मुस्कुरा कर बोली|
"बताती हूँ तुझे ठहर जा" कहती सुमि घर के बाहर हो ली|
रिया आवाज देती रह गयी| पीछे पल्लव के ठहाके गुंज रहे थे|

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