सुमि दरवाजे पर ही ठिठक गयी| पल्लव स्मार्ट और हाजिरजवाब हो गया था| जिस पल्लव से अब तक सिमि मिली थी उस पल्लव से एकदम उल्ट| आज तो बाजी पलटी हुई थी|
रिया ने सुमि को टोहका लगाया|पल्लव से हाय- हैलो भी हुई| पल्लव के मन में सुमि के लिये जो कुछ भी भाव रहे हो| उसने तनिक जाहिर न किया| न कोई खास उत्साह, न मिल लेने की कोई उत्कठां| बस जैसे पहले मिला करते थे| वैसा रुटीन सा|
सुमि को अजीब लगना ही था| अब तक तो उसे यही लगता रहा कि पल्लव उसे ही सबसे ज्यादा तरजीह देता हैं| आज लगा कि उसका ऐसा सोचना भ्रम था, कोई गल्तफहमी| अजीब रिया को भी लगा| ऐसी ही बेरुखी दिखानी थी तो बुलावा क्यों भेजा? शायद उसी कारण से कि "जो दिन मुझे दिखाये वही आज तुम भी झेलो"|
" अपना पल्लव तो बिल्कुल बदल गया हैं| सुमि को भी नहीं पुछ रहा" रिया कह उठी|
" अच्छा हैं न!!!! तु ही मिल लेने को ज्यादा उतावली हो रही थी| मैंने मना भी किया था" ये कह सुमि मानो अपने मन की भड़ास निकाल लेना चाहती थी|
सुमि को रिया- मधु के मिल जाने का ही सुकून था| उसका बेरागी जीवन इन दोनो के मिल जाने से खिल उठा जैसे|
नहीं तो" मुल्ला की दौड़ मजिस्द तक" वाला हाल हो गया था उसका|
बातो-बातो में खुलासा हुआ कि पल्लव अब पढा़ई खत्म कर इसी शहर में रह अपने पापा के कारोबार में मदद करेगा| सुमि को अच्छा ही लगा|
अपने पुराने स्कुल के दिनो को याद करना, उससे जुड़ी कोई बात पल्लव ने नहीं छेड़ी| शायद वो जख्म थे जिसे वो उभारना नहीं चाहता था|सुमि के आने न आने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा|
फिर कुछ हुआ यूँ कि उस रात की पार्टी के बाद किसी दोस्त का आपस में मिलना न हुआ| सुमि- रिया का मिलना वैसा ही होता रहा|उनकी दोस्ती में अभी भी वही गर्म जोशी थी| रिया का आना जैसे उसके नीरस जीवन में ठंडी फुहार की तरह था|
आते शनिवार को रिया ने बताया कि पल्लव ने उसे और उसके पति को खाने पर बुलाया हैं| सुन सुमि के दिल को चोट लगी| पल्लव ने शायद उसे एकदम उपेळित करने का मन बना लिया था|
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