अभिनव के घर पहुँचते उसके दिल की धड़कने बढ़ गयी| पर वैसा लड़कपन अब कहाँ? दरवाजा अभिनव ने ही खोला| वैसा ही मोहित रुप लिये| पल भर को श्रेया खो सी गयी उस चहेरे में| फिर संभल कर बोली," पहचाना नहीं मुझे, मैं श्रेया?"
अभिनव ने उसे पहचान लेने में वक्त लिया," अरे! मोटी तु!!!!! तुम तो कितना बदल गयी हो| पहचानी नहीं जा रही? अभिनव के चेहरे पर जो प्रशंसा के भाव आये उसे देखने को ही तो तरसी थी|
वो फांक जो कही गहरे गड़ी थी, आज निकल रही थी| जाने क्यों आज उसे अपनी जीत का अहसास हुआ|
" अरे! दरवाजे से ही विदा कर दोगे क्या? चाय- पानी भी नहीं पुछोगे?" श्रेया जैसे अदंर आने को उत्सुक हुई जा रही थी|
भीतर आ बड़ी-बड़ी ढी़गे हांकने वाले अभिनव का हाल परख लेना ज्यादा कठिन न हुआ| औसत मध्यम वर्ग के जैसे ड्रांइग रुम होते हैं उससे अलग कुछ भी न था| शायद यही आखिरी स्थिती होती जो अभिनव नहीं चाहता था|
श्रेया को हंसी भी आई और सतोंष भी हुआ,"लच्चेछार बाते करने वाला आज कहाँ हैं और वो कहाँ?"जो सुकून इतने बरस छीजता चला गया था आज वापस पा लिया जैसे|इस भूमिका में श्रेया को मजा आ रहा था| अभिनव का खिसियाया चेहरा उसे सुकून दे रहा था जैसे|
श्रेया सोफे पर ही पसर गयी| अभिनव अभी तक संभल नहीं पाया था शायद| इसलिये बातो का छोर श्रेया ने ही पकड़ा|
" आजकल क्या कर रहे हो अभिनव? विदेश जाने का नहीं सोचा क्या?" श्रेया ने जान कर इस बात को उठाया| अभिनव का सिर केवल न के लिये ही हिल पाया|
श्रेया की मंहगी साड़ी और परफ्युम बता रहे थे कि आज वो कितनी सफल हैं|
" अभिनव का मन जरुर सोच रहा होगा कि काश मैंने श्रेया नाम की बैसाखी पकड़ी होती तो आज मे़ैं भी कहाँ होता? आज मैं किसी हूर से कम नहीं लग रही होगी?"श्रेया का मन ये सोच जाने कितने सतोंष से भर उठा|
श्रेया ने महसूस तो किया कि उसकी उपस्थिती अभिनव को असहज कर रह हैं| आज वो वहाँ खड़ा था जहाँ कितने बरसो श्रेया ने अपने को खड़ा पाया था|
" अभिनव हम इतनी दूर से आये| क्या अपनी पत्नी से नहीं मिलवाओगे? ये कहते श्रेया के चेहरे पर जरा दर्द नहीं आया| शायद भावनाएँ इतनी आहत हो चुकी थी कि कोई अहसास ही बाकी नहीं रह गया था|
" हाँ, हाँ क्यों नहीं! " कहता अभिनव भीतर की ओर बढ़ गया|
थोडी देर में एक सुदंर, सलोनी लड़की श्रेया के सामने खड़ी थी शिष्टाचार से हाथ जोडे|जैसा अभिनव ने चाहा था|
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