श्रेया देखती ही रह गयी उसकी बड़ी-बड़ी मासूम आँखो को|" आओ न बैठो" श्रेया ने स्नेहस्कित स्वर में कह अपने पास बिठा लिया| श्रेया ने उसके हाथ में एक लिफाफा पकड़ा दिया|
लिफाफा लेते वो संकोच से भर उठी| आँख उठा मानो उसने अभिनव की सहमति लेनी चाही|
" उसे न देखो| उसने तो शादी में बुला लेने की भी जहमत नहीं उठायी|अपने खास दोस्तो को यूँ भुलाया जाता हैं क्या? श्रेया जानबुझ कर ऐसी बाते छेड़ रही थी|
उसकी बाते अभिनव को असहज बना रही थी| अभिनव के कच्चे चिठ्ठे खोल लेने में श्रेया को मजा आ रहा था| अभिनव की पत्नी के साथ बैठ लेने में उसे कोई ईष्या न हुई|अहसास मर गये थे शायद|
रुपा था उसका नाम| जैसा रुप वैसा नाम|
रुपा लिफाफा ले अभी तक असमंजस में बैठी थी|
" अरे! रख लो भाई| ये मेरे तुम्हारे बीच की बाते हैं| इसमें अभिनव से क्या पुछना," श्रेया सधिकार बोली|
उसका ऐसा अधिकार जतलाना अभिनव को खल गया| अपनी बीवी के सामने किसी और की लताड़ खाना उसे नहीं सुहाया|
" जाओ जा कर चाय बनाओ| यहाँ बैठी क्या गप्पे ही मारती रहोगी?" अभिनव ने आदेशात्मक लहजे में कहा| वो अपना आधिपत्य रुपा के ऊपर तो जरा कम नहीं होने देना चाहता था|
अभिनव का ये लहजा बरबस ही श्रेया को अपना समय याद दिला गया| वो भी तो किसी निरह गाय की तरह यूँ ही अभिनव की हर सही- गल्त बात पर सहमति लगा देती थी| बस अब श्रेया का स्थान रुपा ने ले लिया था|
आज श्रेया को अचरज हुआ कि क्यूँ उसने अभिनव का ऐसा ओछा व्यहवार सहन किया| वो तो बंधी न थी अभिनव से|
शायद अपने को कहीं भी खड़ा न कर पाने का जो मलाल था उसकी सारी भड़ास वो रुपा पर ही निकालता था|शायद इससे उसका अहम संतुष्ट होता था|
आज रुपा भी तो उसी की मांनिद सर झुका अभिनव के झुठे अहः को सतुंष्ट कर रही थी|
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