तीसरी किस्त

" क्यों री लाडो आज तो बहुत खिल रही हैं" भाभी ने चुहल की|
" भाभी मैं अब वो आपकी नाजूक सी श्रेया नहीं हूँ अब मैं कुछ बन कर ही दिखाऊँगी" श्रेया आत्मविश्वास से लबरेज थी|
" अच्छा लगा तुझे देख कर| तु इसी तरह तरक्की के पायदान पर चढ़ मेरी लाडो" भाभी का स्वर स्नेह से भीग उठा|
   श्रेया अचानक आ भाभी से लिपट गयी| इतने देर का रुका बांध आसूँओ के रास्ते बह निकला| श्रेया ने सारी बात का खुलासा कर दिया भाभी से|
  भाभी ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा| " तु जो करेगी अच्छा ही करेगी|"
" ऐसी प्यारी भाभी मुझे कहाँ मिलेगी|मैं तो वैसे ही आप पर निहाल हूँ| आप के होते मुझे बराबर अहसास रहता हैं कि कोई हैं मेरा सारा दर्द सोंक लेने को| बिना अहसान जताये|" श्रेया हसंती हूई बोली|
" भाभी से चुहल करती हैं लाडो," भाभी के स्वर में लगाव था|
" नहीं भाभी, सच ही कहती हूँ" श्रेया भाभी के गले लग कर बोली|
   उस दिन के बाद से अभिनव की कोई बात न हूई घर में| शायद भाभी ने माँ को वहाँ रिश्ता कर लेने से रोक लिया था| श्रेया को राहत मिली| माँ के चुभते सवालो के जवाब अभी तो नहीं दे पायेगी|
    श्रेया ने अब आगे पढ़ कुछ बन जाने का सोचा| यहाँ रह उसकी पढ़ाई नहीं हो सकती थी| रात-दिन अभिनव से सामना होता| जिससे अब वो बचना चाह रही थी|
     श्रेया ने मुबंई जा अपने आगे की पढ़ाई जारी रख लेने का मन बना लिया| उस दिन के बाद से दोनो परिवारो के बीच एक अनदेखी दीवार खींच गयी|
   समय अपनी गति से बहता रहा| अभिनव के साथ बुने वो  सारे सपनो पर समय की धुल चढ़ती चली गयी| और सब कुछ धुमिल पढ़ता गया| बस जिंदा था तो वो तिरस्कार|
   तब की निकली श्रेया ने आज ६ साल बाद अपने शहर की ओर कदम बढ़ाये थे|घर के लोग ही श्रेया से मिल आते थे|
      इन छः सालो ने अपनी छाप छोड़ी थी| कितना कुछ बदल गया था| शहर भी और लोग भी| अभिनव का परिवार कहीं और जा बसा था| किराये के घर में बसर भी कितने दिन होती?
      श्रेया में भी तो कितना बदलाव आ गया था| तेल लगे बालो की दो कसी चोटियों की जगह शैंपु किये करीने से कटे खुले बाल आ गये थे| उठने- बैठने का अदांज, बात करने का लहजा सब तो बदल गया था|
       श्रेया के मन का एक कोना फिर से जीविंत हो उठा मानो यहाँ आ कर| facebook के जरिये उसने अभिनव को खोज निकाला| उसका ' स्टेटस' मैरिड देख श्रेया का मन चिहुंक उठा| अपनी एक common friend के जरिये उसने अभिनव का घर खोज निकाला|
    अभिनव का चेहरा आज भी वैसा ही मोहित करने वाला था| उसके frdshiplist को देख जाने कितने चेहरे याद आते गये| श्रेया वापस जाने से पहले अभिनव से मिल लेना चाहती थी|
     दो दिन बाद ही तो रविवार था| उसी दिन उसने अभिनव के घर हो आने का मन पक्का कर लिया| कोई लड़ाई थोड़े थी| वे दोस्त तो अभी भी थे|

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top